surdas the devotee with divine eyes

दिव्य चक्षु वाले भक्त सूरदास

भक्त सूरदास जी का जन्म दिल्ली के पास सिंही गॉव में सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था. इनकी आंखों पर पलके नही थी बल्कि चमड़ी का पर्दा था, इसलिए वह कहते थे कि मैं अंधा नही हूँ सूरदास हूँ. अंधा तो वह होता है जिसकी आंखों में रोशनी नही हो. मेरे तो आंखे ही नही है.

आँखें भले ही नहीं थी परंतु सूरदास के पास दिव्य दृष्टि थी. एक बार सूरदास के गरीब माँ बाप को बड़ी मुश्किल से मिले हुए 5 रुपये खो गए, तो इन्होंने कहा कि मैं 5 रुपये बता दूंगा मगर शर्त यह है कि उसके बाद में घर छोड़ कही चला जाऊंगा. माँ बाप को इन पर बिल्कुल भी विश्वास नही था फिर भी उन्होंने शर्त मंजूर कर ली. सूरदास जी ने वह सटीक जगह बता दी जहां 5 रूपये रखे थे यह देखकर सब चकित रह गए. लेकिन फिर लाख मना करने के बाद भी सूरदास ने घर छोड़ दिया और भगवान के भजन में लग गये.

सूरदास जी जन्म से नेत्रहीन थे, लेकिन उनकी आध्यात्मिक दृष्टि इतनी गहरी थी कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल और बाल लीलाओं का मनोहारी वर्णन  किया है. 

भक्तिकाल के सूरदास जी प्रमुख कवि थे और वे कृष्ण भक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं. उन्होंने अपनी रचनाओं में विशेष रूप से वात्सल्य रस, श्रृंगार रस और भक्ति रस का प्रयोग किया. उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं.

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