भक्त शिरोमणि मीराबाई का जन्म नागौर जिले में मेड़ता के समीप कुड़की गाँव में हुआ था. बचपन में एक साधारण सा वाकया मीराबाई के जीवन का सार बन गया, जब बारात में दूल्हा देखकर मीराबाई ने अपने दादा जी से पूछा मेरा दूल्हा कहां है, तो दादा जी ने भगवान् कृष्ण की एक मूर्ति को देखकर कहा तुम्हारा दूल्हा यह है. तब से मीराबाई कृष्ण को अपना पति मानकर उनकी भक्ति में पत्नी की तरह लीन हो गई, और अंत समय में द्वारका धाम में उसी श्री कृष्ण मूर्ति में समा गई.
मीराबाई की भक्ति के लिए उन्हें भक्त शिरोमणि भी कहा जाता है.
विरक्त मीराबाई भक्तों की टोली में रही जो प्रेमी के लिए मुमकिन नहीं हो सकता है।
भक्ति काल के महान दूरदर्शी संत गुरु रामानंद के शिष्यों में एक संत रैदास जी थे, इन्ही रैदास जी ने कृष्ण भक्तिनी मीरा जी को शिष्या रूप में स्वीकार किय था. गुरु रविदास जी आडम्बर, दिखावा, चतुरता, जाति-पाति प्रथा, ठग, कंजूस, अमीरी, इत्यादि सामाजिक विसंगतियों का तर्क पूर्ण उत्तर देते थे. जिससे लोग प्रभावित होकर उनके नतमस्तक हो जाते थे.
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