सनातन धर्म, हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार है, नवरात्र का त्योहार. यह पर्व शक्ति उपासना के अनुष्ठान का पर्व है. वर्ष में दो बार नवरात्र उत्सव की पारंपरिक व्यवस्था है. वसंतीय और शारदीय नवरात्र जो कि चैत्र तथा अश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते है.
शारदीय नवरात्र में प्रतिपदा को देवी उपासना के लिए घट स्थापना, उपासना में जौ बोये जाते हैं, देवी के चित्र की स्थापना की जाती है. व्रत रखे जाते हैं. देवी महात्म्य के देवी पुराण, दुर्गा सप्तशती आदि का पाठ किया जाता है. देवी माँ के भक्त विशेष प्रयोजन से मंत्र साधना भी करते हैं.
अष्टमी नवमी को कन्या पूजन के साथ देवी अनुष्ठान को पूर्ण किया जाता है. शारदीय नवरात्र में देवी की मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है.
दुर्गा सप्तशती और देवी भागवत में वर्णित कथा - नवरात्र की कथा संक्षेप में इस प्रकार है, कि एक बाद देवताओ और असुरो में संग्राम चल रहा था, असुर चाहते हैं, कि देवताओं के स्वर्गलोक पर अधिकार कर तीनो लोको में अपना अधिकार जमा लें.
क्योंकि देवता स्वर्गलोक में सुख सुविधा का उपभोग करते हैं. पृथ्वी लोक में जो यज्ञ भूमि में पुण्यकारक कार्य होते हैं, उनका यज्ञ भाग प्राप्त करते हैं. असुर यह सब लेना चाहते थे. इसीलिए एक बार महिषासुर नाम के राक्षस ने घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि मैं किसी देवता, मानव, दानव के हाथों से ना मारा जाऊं.
अब महिषासुर ने अपनी विशाल सेना बनाकर भूलोक पर अधिकार कर लिया और स्वर्गलोक पर चढ़ाई कर संग्राम में इंद्र आदि देवताओं को बुरी तरह से पराजित कर दिया. स्वर्गलोक पर भी महिषासुर का कब्ज़ा हो गया. भगवान विष्णु, शिव जी भी महिषासुर को पराजित नहीं कर पाए.
तब सभी देवता विष्णु लोक गए, भगवान विष्णु के सामने अपनी समस्या प्रस्तुत की. भगवान विष्णु ने कहा हम सभी देवता अपने तेजांश के प्रकट होने के लिए प्रार्थना करें, सबने ऐसा ही किया सबके तेजांश से एक विशाल तेजपुंज बन गया और वो स्त्री रूप में बदल गया.
तेजपुंज वाली वो स्त्री सुंदर, दिव्य, मनोहर, आठ भुजावाली कांति से संपन्न थी. सभी देवताओं ने अपने-अपने शस्त्र देवी को प्रदान किये. चक्र, त्रिशूल, बाण, कालपाश, परशु, गदा, घंटा, आदि कवच आभूषण भी प्रदान किये गये. फिर सभी ने मिलकर देवी की स्तुति की तथा दानव महिषासुर को मारने की प्रार्थना की.
देवी दुर्गा का महिषासुर से भीषण युद्ध हुआ. उन्होंने पहले उसके सेनापति बाष्काल, दुर्मुख, चिक्षुर, ताम्र, बिड़लख्या, असिलोमा आदि का वध किया. चींटी में महिषासुर युद्ध करने आया, कभी भैंसे के रूप में कभी हाथी के रूप में युद्ध करने लगा.
देवी ने त्रिशूल से पहले उसके पेट को फाड़ा और फिर चक्र चलाकर उसका मस्तक अलग कर दिया. शक्ति की जीत और महिषासुर के वध पर देवताओ ने मिलकर माता की स्तुति की वंदन किया. इस प्रकार देवताओ को स्वर्गलोक पुनः प्राप्त हो गया. बाद में देवी ने शुम्भ, निशुम्भ, धूम्रलोचन, चण्ड, मुंड, रक्तबीज आदि राक्षसो का वध किया. देवताओ को राक्षसो के कष्टों से मुक्त कराया.
नवरात्र का आध्यात्मिक व धार्मिक महत्व:- सनातन धर्म परम्परा में पंचदेव पूजा प्रधान है. उसी के अनुसार पांच सम्प्रदाय प्रमुख है. शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, और सौर. शाक्त सम्प्रदाय में शक्ति की पूजा प्रधान है. नवरात्र में सभी सम्प्रदायों के अनुयायी अपनी-अपनी आस्था, श्रद्धा व परम्परा से देवी की आराधना, पूजा करते है. दुर्गा पूजा विशेष कामना से भी की जाती है.
कन्या पूजन - एक सभ्य समाज की परम्परा देवी पूजा - नवरात्र नारी सम्मान का पर्व भी है. विश्व की एक मात्र हिन्दू संस्कृति ऐसी है जिसमे नारी सम्मान को महत्व दिया गया है. इतना ही नहीं उसको देवी का दर्जा दिया गया है. नारी का ईश्वर रूप भी मान्य है, पूज्य है.
दुर्गा केवल देवी का स्वरुप ही नहीं है, यह भाव सामाजिक संस्कारो, व्यवहारों, समबन्धो में भी जीवंत रूप से विधमान है. इस परम्परा को जीवंत रखने लिए नवरात्र पर्व में कन्या पूजन का सोपान है.
कन्या पूजन हेतु छोटी उम्र की कन्याओ जिनकी उम्र 2 वर्ष से 11 वर्ष तक होती है को आमंत्रित किया जाता है. कन्याये अपने घर परिवार की नहीं, मोहल्ले, बस्ती, सभी वर्गों और समाज जातियों की होती है. कन्याओं के पैर धोकर उसका पंचोपचार से पूजन कर पकवान, मिष्ठान दिया जाता है. यथाशक्ति दक्षिणा, वस्त्र या अन्य उपहार भी भेट किये जाते है, प्रणाम करते है, आशीर्वाद लेते है.
कन्याओ और महिलाओ में देवी स्वरुप दृष्टि या भाव रखना हजारों वर्षो से इन संस्कारो के कारण बना है. इन्ही की प्रति वर्ष पुनरावृति के लिए नवरात्र मनाये जाते है.
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