sacche bhakto ke liye nange pair daude chale aate hai bhagwan

सच्चे भक्तो के लिए नंगे पैर दौड़े चले आते है भगवान

भगवान हमेशा अपने भक्तो की भक्ति की परीक्षा लेते है और जो इस परीक्षा में अपना विश्वास बनाये रखते है उनके लिए भगवान भी नंगे पैर तक दौड़े चले आते है तथा अपने भक्तों के दुखो को हरते है. जिसका सबूत है यह किस्सा.

काफी समय पहले की बात है अयोध्या में एक आश्रम है जिसे बड़ी जगह या दशरथ महल के नाम से जाना जाता है. उस समय यहां एक संत रहा करते थे जिनका नाम रामप्रसाद जी था, इस आश्रम में एक मंदिर था जो उस आश्रम के कर्ता धर्ता थे. जहा श्री राम, श्री लक्ष्मण, श्री भरत एवं श्री शत्रुघ्न जी चारो भाइयो के साथ उनकी पत्नियों और हनुमान जी की सेवा होती थी, उस समय अयोध्या में दर्शन के लिए ज्यादा लोग नहीं आते थे,  तो जो थोड़ा बहुत चढ़ावा मंदिर में आता था उसी से मंदिर और आश्रम का खर्च चलता था. 

प्रतिदिन मन्दिर में आने वाला सारा चढ़ावा एक बनिए को भिजवाया जाता था, जिसका नाम था पलटू बनिया. चढ़ावे के धन से थोड़ा बहुत जो भी राशन आता था उससे भोग-प्रसाद बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता था और  बचता था उसी से आश्रम में वो संत खाते थे. 

एक दिन मन्दिर में कुछ चढ़ावा नहीं आया तो श्री रामप्रसाद जी को चिंता हुई, क्योंकि भगवान का भोग बनाने के लिए भी अन्न आश्रम में नहीं था, कोई उपाय ना देखकर श्री रामप्रसाद जी ने दो साधुओं को पलटू बनिया के पास भेजा और थोड़ा सा राशन उधार देने का आग्रह किया ताकि कम से कम भगवान को भोग तो लग ही जाए.

लेकिन पलटू बनिया ने उधार देने से मना कर दिया तथा साधुओ से बोला कि मेरा और महन्त जी का लेना देना तो नकद का है  मैं उधार में कुछ नहीं दे पाऊंगा.   

श्री रामप्रसाद जी को जब यह पता चला तो उन्होंने इसे भगवान की इच्छा मानी, अतः उन्होंने भगवान को उस दिन जल का ही भोग लगा दिया तथा सारे साधु भी जल पी के रह गए. प्रभु की ऐसी परीक्षा थी कि रात्रि में भी जल का ही भोग लगाना पड़ा और सारे साधु भी जल पीकर भूखे ही सोए. 

वहाँ मन्दिर में नियम था कि शयन कराते समय भगवान को एक बड़ा सुन्दर पीताम्बर ओढ़ाया जाता था तथा शयन आरती के बाद श्री रामप्रसाद जी नित्य करीब एक घण्टा बैठकर भगवान को भजन सुनाते थे, पूरे दिन के भूखे रामप्रसाद जी बैठे भजन गाते रहे और नियम पूरा करके सोने चले गए.

धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी तथा करीब आधी रात को पलटू बनिया के घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया. वो बनिया घबरा गया कि इतनी रात को कौन आ गया. जब आवाज सुनी तो पता चला कुछ बच्चे दरवाजे पर शोर मचा रहे हैं उसने हड़बड़ा कर गुस्से में दरवाजा खोला, सोचा कि अभी इन शरारती बच्चो को अच्छे से डांट लगाऊँगा. जब उसने दरवाजा खोला तो देखता है कि चार लड़के जिनकी उम्र लगभग बारह वर्ष से भी कम की होगी  एक पीताम्बर ओढ़ कर खड़े हैं वे चारों लड़के एक ही पीताम्बर ओढ़े थे. उनकी छवि इतनी मन मोहक और लुभावनी थी कि ना चाहते हुए भी पलटू का सारा क्रोध प्रेम में परिवर्तित हो गया तथा वह उन्हें देखता ही रह गया. 

थोड़ी देर बाद पलटू ने बच्चो से पूछा बच्चों...! तुम हो कौन और इतनी रात को क्यों शोर मचा रहे हो...?

बिना कुछ कहे बच्चे घर में घुस आए और बोले, हम रामप्रसाद बाबा के आश्रम से आये है  ये जो पीताम्बर हम ओढ़े हैं. इसके कोने में सोलह सो रूपये बंधे है खोलकर गिन लो ये वो समय था जब आना और पैसा चलता था. सोलह सौ उस समय बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. पलटू को बहुत आश्चर्य हुआ जल्दी जल्दी पलटू ने उस पीताम्बर का कोना खोला तो उसमें सचमुच चांदी के सोलह सौ सिक्के निकले. पलटू बनिया प्रश्न भरी नजरो से उन बच्चों को देखने लगा, तब बच्चों ने कहा, इन पैसों का राशन कल सुबह आश्रम भिजवा देना.

पैसे देखकर पलटू बनिया को बहुत शर्म आई, उसने सोचा आज मैंने राशन नहीं दिया तो  लगता है महन्त जी नाराज हो गए हैं इसीलिए रात में ही इतने सारे पैसे भिजवा दिए वह हाथ जोड़कर बच्चो से बोला मेरी पूरी दुकान भी उठा कर मैं महन्त जी को दे दूँगा तो भी ये पैसे ज्यादा ही बैठेंगे. इतने मूल्य का सामान देते-देते तो मुझे पता नहीं कितना समय लग जाएगा.

बनिया की बात सुनकर बच्चो ने कहा कोई बात नहीं आप एक साथ मत दीजिए अब से रोज थोड़ा-थोड़ा करके सुबह-सुबह आश्रम भिजवा दिया कीजिएगा और आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना मत करना. बच्चो की बात सुनकर पलटू बनिया तो मारे शर्म के जमीन में गड़ा जा रहा था तथा फिर हाथ जोड़कर बोला, जैसी महन्त जी की आज्ञा. इतना कह सुन के वो बच्चे चले गए लेकिन जाते जाते पलटू बनिया का मन भी ले गए.

इधर सुबह जब मंगला आरती का समय हुआ और पुजारी जी ने मन्दिर के द्वार खोले तो देखा भगवान का पीताम्बर गायब है. उन्होंने ये बात रामप्रसाद जी को बताई और सबको लगा कि किसी ने  रात में पीताम्बर चुरा लिया है. जब थोड़ा दिन चढ़ा तो गाड़ी में ढेर सारा सामान लदवा के कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़े हुए पलटू बनिया आया और सीधा रामप्रसाद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा.

रामप्रसाद जी को कुछ समझ नहीं आया उन्होंने पलटू से पूछा कि क्या हुआ वह किस बात की माफ़ी मांग रहा है,  पलटू बनिया ने रामप्रसाद जी के चरणों में लेटे लेटे ही कहा, महाराज रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी. मैं अपने कान पकड़ता हूँ आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना नहीं करूँगा और ये रहा उन बच्चो का पीताम्बर जो रात आपने मेरे घर भेजे थे गलती से वो इसे वही छोड़ आये थे, बड़े प्यारे बच्चे थे. इतनी रात को बेचारे बच्चो को पैसे लेकर आना पड़ा मुझे बड़ा पछतावा हुआ. 

आप बुरा ना मानें तो मैं एक बार उन बालकों को फिर से देखना चाहता हूँ, जब रामप्रसाद जी ने वो पीताम्बर देखा तो पहचान गए कि यह पीताम्बर तो वही है जो गायब हो गया था उन्हें कुछ समझ नहीं आया तथा उन्होंने पलटू बनिया से पूछा कि यह पीताम्बर उसके पास कैसे पंहुचा तब उस बनिया ने रात वाली पूरी घटना सुनाई. पलटू बनिया की बात सुनकर रामप्रसाद जी भागे जल्दी से और सीधा मन्दिर जाकर भगवान के पैरों में पड़कर रोने लगे कि हे प्रभु ...! मेरे कारण आपको आधी रात में इतना कष्ट उठाना पड़ा और कष्ट उठाया सो उठाया मैंने जीवन भर आपकी सेवा की है, आपने मुझे तो दर्शन नहीं दिए और इस बनिए को आधी रात में दर्शन देने पहुँच गए.

जब पलटू बनिया को पूरी बात पता चली तो उसका हृदय भी जैसे रुक सा ही गया क्योकि जिन्हें वह साधारण बालक समझ रहा था, वे तो स्वयं त्रिभुवन के नाथ थे. पलटू बनिया फूट फूट कर रोने लगा और बोला अरे मैं तो चरण भी न छू पाया. इसके बाद पलटू ने कभी भी आश्रम में राशन की कमी नहीं होने दी. आज तक भी वहाँ सन्त सेवा होती आ रही है. इस घटना के बाद से  ही पलटू बनिया को वैराग्य हो गया और और वह वहीं भगवान की सेवा में लग गया यह पलटू बनिया ही बाद में श्री पलटूदास जी के नाम से विख्यात हुए.

उस दिन श्री रामप्रसाद जी की व्याकुलता हर क्षण के साथ बढ़ती ही जा रही थी और रात में शयन के समय जब वे भजन गाने बैठे तो मूर्छित होकर गिर गए. तभी मूर्च्छावस्था में ही उन्हें पत्नियों सहित चारों भाइयों का दर्शन हुआ और उसी दर्शन में श्री जानकी जी ने उनके आँसू पोंछे तथा अपनी ऊँगली से इनके माथे पर बिन्दी लगाई जिसे फिर सदैव इन्होंने अपने मस्तक पर धारण करके रखा. उसी के बाद से इनके आश्रम में बिन्दी वाले तिलक का प्रचलन हुआ.

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