purushottam maas parv katha aur mahatva

पुरुषोत्तम मास पर्व कथा और महत्त्व

पुरुषोत्तम मास को लोंद का महीना, अधिक मास, मल मास, खर मास आदि अन्य दूसरे नामों से भी जाना जाता है. 

हर तीन वर्ष बाद आने वाला अधिक मास इसलिए आता है कि हिन्दू पंचांग में 12 महीने होते हैं. जिनकी गणना का आधार सूर्य और चन्द्रमा होता है. सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है. इन दोनों वर्षों के बीच करीब 11 दिनों का फासला होता है.

11 दिनों के इसी फासले को तीन साल में लगभग एक महीने के बराबर हो जाने की वजह से इस अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में जो एक महीना अधिक हो जाता है, हिंदी पंचांग में जोड़ दिया जाता है. इस प्रकार तीन वर्ष में एकचंद्र मास अस्तित्व में आता है. बढ़ने वाले इस महीने को ही अधिक मास /मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं.

सूर्यदेव और भगवान् विष्णु की पूजा इन दिनों में विशेष लाभकारी होती है तो इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. भगवान् राम को पुरुषोत्तम नाम से जाना जाता है, जो कि विष्णु भगवान् के अवतार थे और सूर्यवंश में उनका जन्म हुआ था.  

सूर्य देव को ग्रहों का राजा माना जाता है. वे  सभी बारह राशियों में क्रमवार गोचर करते हैं, जिसका शुभ और अशुभ प्रभाव लोगों पर पड़ता है. सूर्य जब देव गुरु बृहस्पति की राशियों मीन और धनु में प्रवेश करते हैं तो उस समय खरमास लग जाता है. यह खरमास अंग्रेजी कैलेंडर के मार्च- अप्रैल और दिसंबर-जनवरी के बीच लगता है. वहीं हिंदू कैलेंडर के अनुसार, खरमास फाल्गुन-चैत्र और मार्गशीर्ष-पौष माह के बीच लगता है.

इस अवधि में मांगलिक कार्य नहीं होते है, जैसे ही सूर्य धनु राशि में प्रवेश करता है तभी से खरमास आरम्भ हो जाता है और इसी के साथ शादी विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्य निषेध हो जाते है. इस माह में सूर्य मीन राशि का होता है, ऐसे में सूर्य का बल वर को प्राप्त नहीं होता है. वर को सूर्य का बल और वधू को बृहस्पति का बल होने के साथ ही दोनों को चंद्रमा का बल होने से ही विवाह के शुभ योग बनते हैं. इसी के आधार पर ही विवाह की तिथियां निर्धारित होती है.

खरमास शुरू हो जाने से विवाह संस्कारों पर एक माह के लिए रोक लग जाती है. साथ ही अनेक शुभ संस्कार जैसे जनेऊ संस्कार, मुंडन संस्कार, गृह प्रवेश भी नहीं किया जाता है. भारतीय पंचांग के अनुसार, सभी शुभ कार्य रोक दिए जाते है. खरमास कई स्थानों पर मलमास के नाम से भी विख्यात है. शास्त्रों में मलमास शब्द की यह व्युत्पत्ति निम्न प्रकार से बताई गई है.

मली सन् म्लोचति गच्छतीति मलिम्लुचः 

अर्थात् मलिन (गंदा) होने पर यह आगे बढ़ जाता है.

हिन्दू धर्म ग्रंथों में इस पूरे महीने में किसी भी शुभ कार्य को करने की मनाही है.

जब गुरु की राशि धनु में सूर्य आते हैं तब खरमास का योग बनता है. वर्ष में दो मलमास पहला धनुर्मास और दूसरा मीन मास आता है. यानी सूर्य जब-जब बृहस्पति की राशियों धनु और मीन में प्रवेश करता है तब खर या मलमास होता है क्योंकि सूर्य के कारण बृहस्पति निस्तेज हो जाते हैं. इसलिये सूर्य के गुरु की राशि में प्रवेश करने से विवाह संस्कार आदि कार्य निषेध माने जाते हैं. 

विवाह और शुभ कार्यों से जुड़ा खरमास का यह नियम मुख्य रूप से उत्तर भारत में लागू होता है. जबकि दक्षिण भारत में इस नियम का पालन कम किया जाता है. मद्रास, चेन्नई, बेंगलुरू में इस दोष से विवाह आदि कार्य मुक्त होते हैं.

खरमास में व्रत का महत्व - खरमास में पूरे माह व्रत का पालन कर व्यक्ति को इस पूरे माह भूमि पर ही सोना चाहिए. एक समय केवल सादा तथा सात्विक भोजन करना चाहिए. खरमास में व्रत रखते हुए भगवान पुरुषोत्तम अर्थात विष्णु जी का श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहिए तथा मंत्र जाप करना चाहिए. श्री पुरुषोत्तम महात्म्य की कथा का पठन अथवा श्रवण करना भी इन दिनों में बहुत अच्छा माना जाता है. इसके अलावा श्री रामायण का पाठ या रुद्राभिषेक का पाठ करना व श्री विष्णु स्तोत्र का पाठ करना भी बहुत शुभ होता है.

मास के आरम्भ के दिन श्रद्धा भक्ति से व्रत तथा उपवास रखना चाहिए. इस दिन पूजा – पाठ का अत्यधिक महात्म्य माना गया है. खरमास मे प्रारंभ के दिन दानादि शुभ कर्म करने का बहुत अधिक फल मिलता है. ऐसा कहा जाता है, कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत तथा पूजा आदि कर्म करता है वह सीधा गोलोक में पहुंचता है और भगवान श्री कृष्ण के चरणों में स्थान पाता है.

खरमास की समाप्ति पर भी स्नान, दान तथा जप आदि का अत्यधिक महत्व होता है. इस मास की समाप्ति पर व्रत का उद्यापन करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और अपनी श्रद्धानुसार दानादि करना चाहिए. इसके अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण बात यह है कि खरमास माहात्म्य की कथा का पाठ श्रद्धापूर्वक प्रात: एक सुनिश्चित समय पर करना अधिक फलदायक होता है.

इस मास में रामायण, गीता तथा अन्य धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों के दान आदि का भी महत्व माना गया है. वस्त्रदान, अन्नदान, गुड़ और घी से बनी वस्तुओं का भी खरमास के दिनों में दान करना अत्यधिक शुभ माना जाता है.

खरमास की पौराणिक प्रचलित कथा .. 

लोक कथाओं के अनुसार खरमास या मलमास को अशुभ माह मानने के पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है. जिसके अनुसार खर गधे को कहा जाता है और धार्मिक मान्यताओं में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार एक बार सूर्य अपने सात घोड़ों के राथ को लेकर ब्राह्मांड की परिक्रमा करने के लिए निकले थे.

इस परिक्रमा के दौरान सूर्य देव को रास्ते में कहीं भी रूकने की मनाही होती है, लेकिन सूर्य देव के सातों घोड़े कई साल निरंतर दौड़ने की वजह से जब प्यास से व्याकुल हो जाते हैं तो सूर्य देव उन्हें पानी पिलाने के लिए निकट बने एक तलाब के पास रूक जाते हैं. तभी उन्हें याद आता है कि उन्हें तो रास्ते में कहीं रूकना ही नहीं है तो वो कुंड के पास कुछ गधों को अपने रथ से जोड़कर आगे बढ़ जाते हैं. जिससे उनकी गति धीमी हो जाती है. यही वजह है कि खरमास को अशुभ माह के रूप में देखा जाता है.

Read more at headlineshunt :

  •     पलक सिधवानी का जीवन परिचय
  •     अदिति जेटली जडेजा वाइफ ऑफ अजय जडेजा
  •     रिवाबा जडेजा वाइफ ऑफ सर रविंद्र जडेजा
  •     केवी कुटीर कुमार विश्वास का इको फ्रेंडली घर
  •     शिल्पा शिरोडकर का जीवन परिचय
  •     श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव और उसका महत्त्व
  •     सपना चौधरी वाइफ ऑफ़ प्रवीण कुमार
  •     अनसूया सेनगुप्‍ता एन एक्ट्रेस एंड प्रोडक्शन डिज़ाइनर
  •     हनुमान भक्त महाराज धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री बागेश्वर धाम सरकार
  •     आयुष बडोनी का जीवन परिचय
  •     पितृ पक्ष में कौवें को खाना खिलाने का वैज्ञानिक महत्त्व
  •     ब्यूटीफुल मेहंदी डिज़ाइनस फॉर करवा चौथ
  •     भुवनेश्वर कुमार का जीवन परिचय
  •     प्रेमानंद जी महाराज श्री राधा जू के परम भक्त
  •     किस्सा सौरव गांगुली और डोना की शादी का