सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध पक्ष की सोलह तिथियों में सबसे महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है. लोग अपने पितरों के निमित्त पितृ पक्ष के दिनों श्राद्ध करते है. जिस तिथि को पितृ की मृत्यु होती है उसी तिथि वाले दिन उनका श्राद्ध किया जाता है, किन्तु कई बार कुछ लोगों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती है. ऐसे में उन सभी पितरों का श्राद्ध पितृपक्ष की अमावस्या को करने का विधान है.
हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन माह की अमावस्या को सर्व पितृ अमावस्या कहा जाता है. क्योंकि पितृ पक्ष की अमावस्या तिथि को सभी ज्ञात अज्ञात पितरों का श्राद्ध करने का विधान है, इसीलिये इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है. शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि अगर किसी को अपने पितरों की तिथि ज्ञात नहीं है तो वह सर्व पितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध कर सकता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन पितरों के निमित्त उपाय करने से उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है. अतः सर्व पितृ अमावस्या को भूले बिसरे सभी पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध किया जाता है.
हमारे शास्त्रों में 21 पीढ़ीयों तक के पूर्वजो का श्राद्ध करने का विधान बताया गया है. किंतु अपनी 21 पीढ़ियों के पूर्वजो की तिथियों को याद रखना असंभव है. और क्योंकि ये सभी पितृ, पितृपक्ष के सोलह दिनों में पितृलोक से पृथ्वी पर अपने परिवार में वास करते हैं. जिन पितरों की तिथियां ज्ञात होती है, उनके निमित्त तो उसी तिथि को श्राद्ध कर दिया जाता है, बाकी शेष पितरों के लिए सर्व पितृ अमावस्या को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए. जो लोग किसी का भी श्राद्ध नही करते है और समझते हैं कि हमने तो गयाजी मे तर्पण करा दिया है, उनको भी अमावस्या को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए. साथ ही अपने पितरों के निमित्त पितृभोग का गौमाताओं को भोजन अवश्य कराना चाहिए.
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