भगवान परशुराम जी श्री हरि विष्णु जी के छठे अवतार हैं. उनका जन्म भृगु ऋषि के कुल में हुआ था, वे ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र थे. उनके पिता ब्राह्मण तथा माता क्षत्रिय थीं. परशुराम पांच भाइयों में सबसे छोटे थे.
वेदों का ज्ञान परशुराम ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि जी से ही अर्जित किया था. अस्त्र शस्त्र की शिक्षा उन्होंने स्वयं भगवान महादेव से प्राप्त की थी. महादेव ने ही परशुराम जी को उनका हथियार फरसा प्रदान किया था. परशुराम जी को पुराणों में चिरंजीवी बताया गया है.
परशुराम जी द्वारा अपनी माता का वध किया गया था, इस कथा के अनुसार एक दिन परशुराम की माता रेणुका स्नान करके लौट रही थीं, तो उन्होंने रास्ते में चित्ररथ गंधर्व को अपनी पत्नी के साथ क्रीड़ा करते हुए देख लिया जिससे उनका मन भी विचलित हो उठा. जब वह अपनी कुटिया में पहुंची, तो उनके हाव - भाव को पति ऋषि जमदग्नि ने परख लिया और उनकी निंदा करने लगे.
उन्होंने अपने चारों पुत्रों को एक एक करके रेणुका का वध कर देने का आदेश दिया, लेकिन मातृस्नेह के चलते उन्होंने अपनी मां को नहीं मारा. इससे जमदग्नि क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने चारों पुत्रों को शाप दे दिया. फिर जब उन्होंने परशुराम जी को रेणुका का वध करने को कहा, तब परशुराम ने तुरंत ही अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता रेणुका का वध कर दिया. उनके इस कृत्य से पिता जमदग्नि प्रसन्न हो उठे और उन्होंने परशुराम जी को वरदान मांगने के लिए कहा. साहसी और निडर परशुराम ने अपनी दिव्य बौद्धिक क्षमता का परिचय देते हुए बदले में उनसे अपनी माता रेणुका को पुनः जीवित करने और अपने भाइयों को शापमुक्त करने का वरदान मांग लिया जिसको ऋषि जमदग्नि ने पूरा भी किया. इस प्रकार परशुराम ने अपनी दिव्य बौद्धिकता से पिता और माता के साथ ही भाइयों के प्रति अपनी निष्ठां को प्रस्तुत किया.
परशुराम जी द्वारा कार्तवीरयार्जुन के वध की कथा के अनुसार एक दिन ऋषि जमदग्नि के निवास स्थान पर कार्तवीर्य अर्जुन जिसने एक बार रावण को युद्ध में परास्त किया था, आया. देवी रेणुका ने उसका अतिथि सत्कार किया जिसको कार्तवीर्य अर्जुन ने स्वीकार नहीं किया और जमदग्नि की कुटिया को तहस नहस करना आरंभ कर दिया. साथ ही वह बलपूर्वक ऋषि जमदग्नि की कामधेनु गाय (जिसको उन्होंने इंद्र से वरदान के रूप में प्राप्त किया था) को अपने साथ लेकर जाने लगा. यह देखकर परशुराम जी कुपित हो उठे और देखते ही देखते उन्होंने कार्तवीर्य की हजारों भुजाएं काट डाली और अंततः उसका वध कर डाला.
इसके बाद परशुराम जी द्वारा पृथ्वी को इक्कीस बार निःक्षत्रिय किया गया इस कथा के अनुसार एक दिन परशुराम जी की अनुपस्थिति में कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र ने उनकी कुटिया पर आकर अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए निः शस्त्र जमदग्नि का वध कर दिया. जब परशुराम जी को ये ज्ञात हुआ, तो उन्होंने रणभूमि में अकेले ही कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों को उनकी सेना सहित काल के गाल में भेज दिया.
जिन जिन क्षत्रियों ने उनके ऊपर प्रहार किया, उन सबको परशुराम जी ने अकेले ही यमलोक पहुंचा दिया. इस तरह उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय रहित कर दिया था. तथा समस्त पृथ्वी को जीतकर उन्होंने उसकी कमान कश्यप मुनि को सौंप दी और खुद महेंद्र पर्वत पर निवास करने चले गए. चूंकि उन्हें पुराणों में चिरंजीवी की उपाधि मिली हुई है, इसलिए पुराणों के अनुसार वे अभी भी वहां निवास करते हैं.
वाल्मीकी रामायण और व्यास महाभारत में परशुराम जी का प्रसंग आता है, जिसके अनुसार रामायण में जब श्री राम विवाह के बाद अयोध्या लौट रहे थे, तभी परशुराम ने उनका रास्ता रोक लिया था. उन्होंने श्री राम को वैष्णव-धनुष के ऊपर बाण चढ़ाने की चुनौती दी थी, जिसे श्री राम ने आसानी से पूरी कर दी थी. श्री राम ने उस बाण से परशुराम जी के तेज को नष्ट कर दिया था, वह वैष्णव तेज इसके बाद परशुराम जी से निकलकर श्री राम में समाहित हो गया था.
महाभारत में परशुराम जी ने भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे परम पराक्रमी योद्धाओं को अस्त्र विद्या सिखाई थी. ये तीनों योद्धा आगे चलकर कौरव सेना के सेनापति भी बने थे. महाभारत में उनका युद्ध अपने शिष्य भीष्म से भी हुआ था, उस युद्ध में वे भीष्म को परास्त करने में असफल हो गए थे.
पुराणों के अनुसार श्री विष्णु जी के कल्कि अवतार का गुरु होने का सौभाग्य भी परशुराम जी ही प्राप्त करेंगे.
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