दुल्ला-भट्टी एक महान राजपूत योद्धा थे, जो जंगलों में रहा करते थे. दुल्ला भट्टी स्त्रियों का बहुत सम्मान करते थे और उस समय की परिस्थितियों में जब स्त्रियों के अपहरण हो जाते थे. ऐसी स्थितियों में दुल्ला-भट्टी उन स्त्रियों की रक्षा करते थे और उनके विवाह में कम से कम एक सेर शक्कर जरूर देते थे, यह एक सेर शक्कर उस समय वो बहुमूल्य उपहार मानी जाती थी.
अन्याय के खिलाफ एक कुख्यात डाकू बन चुके दुल्ला-भट्टी निर्धनों व शोषितों की सहायता करने की वजह से सभी के हॄदय में अपने लिए अपार श्रद्धा और इज्जत कमा चुके थे.
दुल्ला भट्टी के द्वारा सुंदरी की रक्षा करना
लोहड़ी से जुडी ऐतिहासिक कथा के अनुसार, पंजाब में एक ब्राह्मण रहता था जिसकी सुंदरी नाम की एक लड़की थी जो अपने नाम की भांति ही बहुत सुंदर थी.
वह इतनी रूपवान थी कि उसके रूप, यौवन व सौंदर्य की चर्चा दूर दूर तक थी. यही नहीं उसकी सुंदरता की बात पंजाब के राजा तक भी पहुंच गयी. राजा उसकी सुंदरता का वर्णन सुनकर सुंदरी पर मोहित हो गया और उसने सुंदरी को अपने रनिवास में लाकर उसकी शोभा बनाने का निश्चय किया.
जिसके लिए पंजाब के तत्कालीन राजा ने सुंदरी के पिता को संदेश भेजा कि वह अपनी पुत्री को उसके रनिवास में भेज दे, इसके लिए उसे अकूत धन-सम्पदा दी जाएगी. उसने उस ब्राह्मण को अपनी पुत्री को उसके रनिवास में भेजने के लिए अनेको प्रलोभन दिए. राजा का संदेश मिलने पर बेचारा ब्राह्मण चिंतित हो गया, वह अपनी पुत्री को राजा के रनिवास में नहीं भेजना चाहता था. जिससे बचने के लिए ब्राह्मण उसी रात्रि दुल्ला भट्टी के पास पहुंचा और उसे विस्तार से सारी घटना का विस्तार से विवरण दिया.
ब्राह्मण की व्यथा सुन दुल्ला भट्टी ने उसे सांत्वना दी और रात्रि में ही एक सुयोग्य ब्राह्मण लड़के की खोज में निकल पड़ा. लड़का मिलने पर सुंदरी को अपनी ही पुत्री मान लिया. अग्रि के साक्ष्य में दुल्ला भट्टी ने खुद सुंदरी का कन्यादान किया और ब्राह्मण युवक के साथ सुंदरी का रात्रि में ही विवाह करा दिया. विवाह के समय दुल्ला-भट्टी के पास पुत्री सुंदरी को देने के लिए कुछ भी न था. अत: उसने तिल व शक्कर देकर ही ब्राह्मण युवक के हाथ में सुंदरी का हाथ थमाकर सुंदरी को उसकी ससुराल विदा किया.
जैसे ही राजा को इस बात की सूचना मिली तो क्रोधित हो उठा, उसी समय अपनी सेना को आक्रमण करने तथा दुल्ला भट्टी का समाप्त करने का आदेश दिया.
राजा का आदेश मिलते ही सेना दुल्ला भट्टी के आश्रयस्थल की ओर बढ़ी लेकिन दुल्ला-भट्टी और उसके साथियों ने वीरता का परिचय देते हुए सम्पूर्ण शक्ति लगा कर राजा की सेना को पराजित कर दिया.
दुल्ला भट्टी की जीत और अच्छाई की विजय पर प्रसन्नता में सभी ने अलाव जलाए और दुल्ला-भट्टी की प्रशंसा में गीत गाकर भंगड़ा डाला. कहा जाता है कि तभी से लोहड़ी के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में सुंदरी और दुल्ला भट्टी को विशेषरूप से स्मरण किया जाने लगा.
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