हिन्दू धर्म में प्रत्येक त्यौहार का अपना एक अलग महत्त्व है. जिसे लोग पूरी श्रद्धा से निभाते है, ऐसी ही एक मान्यता के अनुसार कायस्थ समाज के लोग दीपावली के दिन पूजन के बाद लेखनी रख देते है, तथा लेखा जोखा का कोई कार्य नहीं किया जाता, और फिर यमद्वितीया के दिन कलम-दवात के पूजन के बाद ही लेखनी का उपयोग पुनः शुरू किया जाता है.
इस मान्यता से जुडी एक कथा है, कि जब भगवान् राम चंद्र जी रावण का वध करके अयोध्या वापस आये, तो उसी दिन श्री राम का राज्याभिषेक रखा गया हलाकि श्री राम की अनुपस्तिथी में श्री भरत अपने भाई की खड़ाऊ को राज सिंहासन पर रख कर राज्य का संचालन करते थे. लेकिन श्री राम का औपचारिक राज्याभिषेक उनके वनवास से आने के बाद रखा गया. इसी दिन को दीपावली के रूप में मनाया जाता है.
राम चंद्र के इस राज्याभिषेक समारोह में पृथ्वी व स्वर्गलोक के सभी देवी देवताओं को आमंत्रण देने का उत्तरदायित्व श्री वशिष्ठ मुनि को दिया गया था, परन्तु किसी भूलवश वह चित्रगुप्त महाराज को आमंत्रण नहीं दे पाए.
जब श्री राम ने राज्यतिलक में सभी गणमान्य अतिथियो को उपस्थित देखा तो अपने अनुज भरत से चित्रगुप्त के बारे में पूछा, इसके बाद जब चित्रगुप्त जी को खोजा गया तो पता चला, कि गुरु वशिष्ठ के शिष्य भगवान चित्रगुप्त को निमत्रण पहुंचाया भूल गए, जिसकी वजह से भगवान चित्रगुप्त नहीं आये.
इससे भगवान चित्रगुप्त गुस्सा हो गए, जिसके फलस्वरूप उन्होंने अपना कार्य बंद कर दिया तथा यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा जोखा लिखने वाली लेखनी को उठा कर किनारे रख दिया. राजतिलक समारोह के बाद जब सभी देवी देवता वापिस लौटे, तो देखा कि स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे और सारी अर्थ व्यवस्था गड़बड़ा गई है.
इसके बाद गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुए, भगवान राम और गुरु वशिष्ठ ने अयोध्या मे स्थित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर में जाकर भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और अपनी गलती की क्षमायाचना की, जिसके बाद भगवान राम की बात मानकर भगवान चित्रगुप्त ने लगभग 24 घंटे बाद फिर से यम द्वितीया (भाई दूज ) के दिन कलम दवात की पूजा करने के बाद प्राणियों का लेखा -जोखा लिखने का कार्य शुरू कर दिया.
तभी से कायस्थ समाज के लोगो में यह परम्परा है, कि कायस्थ लोग दीपावली की पूजा के पश्चात लेखनी को रख देते हैं, और यमद्वितीया के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम दवात पूजन करके प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही लेखनी को पुनः धारण करते हैं. इस परंपरा का निर्वहन उस दिन से अब तक लगातार होता आ रहा है सभी कायस्थ इस परंपरा का पालन करते हैं.
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