व्यापारिक समुदाय और निगमों का इतिहास कुछ ऐसा रहा है कि भारत के विभिन्न भागों में एक समय अलग अलग समुदाय व्यापार पर हावी हुआ करते थे, जैसे कि -
- उत्तरी क्षेत्र में पंजाबी और मुल्तानी व्यापारी व्यापार संभालते थे.
- पश्चिमी भारत में महाजनों द्वारा व्यापार का प्रबंधन किया जाता था.
- दक्षिण से चेट्टियार लोग महत्वपूर्ण व्यापारी थे.
- गुजरात, राजस्थान में भाट ही प्रमुखता से व्यापार का प्रबंधन करते थे.
- शहरी केंद्रों में महाजन समुदाय अपने मुखिया का प्रतिनिधित्व करते थे जिन्हें नगर सेठ कहा जाता था. महाजनों के अलावा शहरी क्षेत्रों में सक्रिय अन्य समूह थे, हकीम और वैद, वकील, पंडित या मुल्ला, चित्रकार, संगीतकार, सुलेखक आदि.
इसी प्रकार समुदायों ने अपने व्यपारिक हितों को साधने के लिए व्यापारिक निगमों का भी गठन किया हुआ था, जिनकी व्यवस्था कुछ इस प्रकार थी.
व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए कुछ निगम बनाए गए थे, जिनमें सदस्यता को आचार संहिता के अपने नियम और विनियमों से अनुशाषित किया जाता था. यहाँ तक कि राजाओं को भी इन्हे स्वीकार करके सम्मान करना होता था.
निगमों के अनुसार व्यापारियों को आयातित वस्तुओं पर अष्टाधारी शुल्क देना पड़ता था. व्यापार और उद्योग कर भी राजस्व का एक प्रमुख स्रोत थे.
सीमा शुल्क समुदायों के अनुसार अलग-अलग होता था. टैरिफ भी प्रांत दर प्रांत अलग-अलग होते थे.
नौका कर आय का एक अन्य स्रोत था, इसे यात्री माल, मवेशियों और गाड़ियों के लिए चुकाना पड़ता था.
कर स्थानीय निकायों को प्राप्त होता था.
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