aranya rishi maruti chitampalli

अरण्य ऋषि मारुति चितमपल्ली

अरण्य ऋषि के रूप में विख्यात मारुति चितमपल्ली का पूरा नाम  मारुति भुजंगराव चितमपल्ली है, उन्होंने   प्रकृति और वन्यजीवों के लिए जीवनपर्यन्त अद्भुत कार्य किये. उनको वन्यजीव संरक्षण, साहित्य और शिक्षा के प्रति उनके आजीवन समर्पण के सम्मान में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति दौपदी मुर्मू द्वारा 28 अप्रैल, 2025 को प्रतिष्ठित पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित भी किया गया था.

एक महान वन अधिकारी, संरक्षणवादी और विपुल मराठी लेखक के तौर पे पहचाने जाने वाले, मारुति चितमपल्ली के प्रकृति की सेवा में किये गए काम ने कई पीढ़ियों को भारत की प्राकृतिक विरासत की सराहना और सुरक्षा करने के लिए प्रेरित किया है. 

उनको दिया गया पद्मश्री सम्मान कई प्रमुख वन्यजीव अभयारण्यों को विकसित करने, प्रकृति के विषय में उनके लेखन के साथ मराठी साहित्य को समृद्ध करने और पूरे महाराष्ट्र तथा उसके बाहर पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मानित करने के लिए एक छोटी सी भेंट है. 

मारुति चितमपल्ली का जन्म 5 नवंबर, 1932 को महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ था. उनके वन्यजीव संरक्षण, साहित्य और शिक्षा में दिए गए असाधारण योगदान की वजह से वह लोगों के बीच अरण्य ऋषि, वन ऋषि जैसे नामों से प्रसिद्ध थे. 

अपनी माँ के प्रकृति प्रेम से प्रेरित होकर, मारुति चितमपल्ली का जंगल, जीवों के प्रति बचपन से एक विशेष लगाव बन गया था. उन्होंने सन 1958 में कोयंबटूर में राज्य वन सेवा कॉलेज से औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसने वन संरक्षण के क्षेत्र में उनके आजीवन कार्य करने के सफर की नींव रखी.

वन अधिकारी के रूप में मारुति चितमपल्ली ने जीवन के चार दशकों से अधिक समय तक कार्य किया, मुख्य रूप से महाराष्ट्र के विदर्भ और नागपुर के जंगलों में उन्होंने बहुत कार्य किये. इसे वह अपना असली घर भी मानते थे. 

वैसे तो मारुति चितमपल्ली सन 1990 में मेलघाट टाइगर रिजर्व के उप निदेशक पद पर रहते हुए सेवानिवृत्त हुए थे, लेकिन उनकी प्राकृतिक विरासत में कई अन्य प्रमुख वन्यजीव अभयारण्यों और रिजर्वों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ रही. जिनमें नवेगांव राष्ट्रीय उद्यान, नागजीरा वन्यजीव अभयारण्य, कर्नाला पक्षी अभयारण्य, मेलघाट बाघ परियोजना, आदि इन सबका संरक्षण कार्य, वनों के साथ उनके आध्यात्मिक संबंध से गहराई से जुड़ा हुआ था, जिसे उन्होंने उन्होंने अपनी विनम्रता, धैर्य और प्रेरणा का स्रोत बताया था. 

मारुति चितमपल्ली मराठी भाषा में प्रकृति लेखन के भी अग्रणी रहे, वह वैज्ञानिक ज्ञान को रचनात्मक कहानी कहने जैसे लेखन के रूप में बदलने की विशेष कला में निपुण थे. मारुति चितमपल्ली की पहली पुस्तक, पक्षी जय दिगंतरा, जो सन 1981 में आयी थी, तुरंत बेस्टसेलर बन गई थी. इस पुस्तक ने उनके विपुल साहित्यिक करियर की भी शुरुआत कर दी थी. 

अपने जीवन काल लगभग 25 पुस्तकें लिखने वाले मारुति चितमपल्ली, की लिखी गयी पक्षीकोश (पक्षियों का शब्दकोश), प्राणिकोश (पशुओं का शब्दकोश), वृक्ष कोष (वृक्षों का शब्दकोश), रतावा, रणवता, मृगपक्षीशास्त्र,  शब्दांचे धन, जंगलाचे देने, आदि रचनाएँ शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए अनेक आवश्यक संदर्भों के रूप में भी प्रयोग की जाती है. 

साहित्य के क्षेत्र में भी मारुति चितमपल्ली ने उल्लेखनीय रूप से लगभग 100,000 नए शब्दों को शामिल करके मराठी भाषा को और अधिक समृद्ध किया, जिनमें से कई उन्होंने विदर्भ के आदिवासी समुदायों के बीच वन संरक्षण के कार्य करते हुए एकत्र किए गए थे, इस प्रकार मारुति चितमपल्ली द्वारा स्वदेशी ज्ञान को संरक्षित कर आगे बढ़ाया गया.

एक गुरु और मार्गदर्शक के रूप में भी मारुति चितमपल्ली को खूब ख्याति मिली. उनके मार्गदर्शन में कई वन अधिकारियों, प्रकृति प्रेमियों और पत्रकारों की कई पीढ़ियों ने शिक्षा और ज्ञान अर्जित किया, इन शिक्षार्थीयों को वह अक्सर जंगलों में शैक्षिक यात्राओं पर ले जाते थे. 

मारुति चितमपल्ली ने सन 1987 में पहले महाराष्ट्र पक्षीमित्र सम्मेलन और सन 2006 में सोलापुर में मराठी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की भी थी. यह किसी पर्यावरण संरक्षणवादी के लिए बहुत दुर्लभ सम्मान माना जाता है.

मारुति चितमपल्ली को उनके महान कार्यों के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जैसे कि -

पद्म श्री (2025)
जंगलाचा देना, रणवाता और रतवा के लिए महाराष्ट्र राज्य साहित्य पुरस्कार, 
नागभूषण पुरस्कार (2008),
विदर्भ साहित्य संघ का जीवनव्रती पुरस्कार (2003),
वसुंधरा सम्मान (2009),

जैसा कि उनके लेखन में भी व्यक्त किया गया है, चितमपल्ली का दर्शन, जंगल को भारतीय जीवन और विचार का एक पवित्र केंद्र मानता है. उन्होंने लोगों और प्रकृति के बीच बढ़ते अलगाव पर दुख व्यक्त किया, और समाज से वनों को संजोने और उनकी रक्षा करने का आग्रह किया. 

सेवानिवृत्ति के बाद भी, उन्होंने सोलापुर में अपने घर से लिखना, शिक्षित करना और प्रेरित करना हमेशा जारी रखा, अपनी डायरियों और नोट्स के साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए वह बड़ी विरासत छोड़कर गए है.

अरण्य ऋषि मारुति चितमपल्ली का जीवन समर्पण की शक्ति का प्रमाण है, जिसमें वैज्ञानिक कठोरता को सांस्कृतिक संरक्षण और साहित्यिक कलात्मकता के साथ सुन्दर सामंजस्य से मिलाया गया है. 

मारुति चितमपल्ली की विरासत महाराष्ट्र के जंगलों, समृद्ध मराठी भाषा और उन अनगिनत व्यक्तियों में सदैव मौजूद रहेगी, जिन्हें उन्होंने जंगल को सिर्फ़ जंगल के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत कक्षा और ज्ञान के स्रोत के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया.

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