गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों के दसवें और अंतिम मानव गुरु थे. सिख धर्म एक एकेश्वरवादी धर्म है, जिसकी उत्पत्ति 15 वीं शताब्दी के अंत में भारत के पंजाब क्षेत्र में हुई थी. इस धर्म को सिखमत और सिखी भी कहा जाता है. सिख धर्म प्रमुख वैश्विक धर्मों में से एक है, और दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा संगठित धर्म है.
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 05 जनवरी 1666 को हुआ था, इनके पिता का नाम गुरु तेगबहादुर और माता का नाम गुजरी देवी था. गुरु गोबिंद सिंह के पिता गुरु तेगबहादुर जी नौवें सिख गुरु थे. गुरु गोबिंद सिंह जी के बचपन का नाम गोविन्द राय था. पटना में जिस घर में गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था, वहीं पर अब तखत श्री पटना साहिब स्थित है.
गुरु गोबिंद सिंह जी की तीन पत्निया थी. जिनमें से पहली पत्नी का नाम जीतो था. जीतो और गुरु जी की कई साल तक कोई संतान नहीं हुई, तो गुरुमाता के दबाब डालने पर गुरु जी ने दूसरी शादी की और उनकी दूसरी पत्नी का नाम सुंदरी था. सुंदरी से गुरु गोबिंद सिंह को एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम अजित सिंह रखा गया. अजित सिंह, गुरु गोविंद सिंह जी के सबसे बड़े पुत्र थे. इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह जी की पहली पत्नी माता जीतो को भी तीन पुत्र हुए. जिनके नाम जुझारू सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह थे.
साहेब देवन, गुरु गोबिंद सिंह की तीसरी पत्नी था, जिनसे इन्होने संगत और परिवार वालो के दबाव के कारण शादी की थी. गुरु गोबिंद सिंह जी ने शादी से अपनी इस तीसरी शादी से पहले ही शर्त रखी थी, क़ि साहेब देवन के साथ उनका सिर्फ आध्यात्मिक रिश्ता होगा, इसलिए गुरु जी को माता साहेब देवन से कोई संतान नहीं हुई, लेकिन गुरु गोबिंद सिंह ने इन्हे खालसा पंथ की माता घोषित किया. तभी से सब नवदीक्षित शिष्य गुरु गोबिंद सिंह जी और माता साहेब देवन के पुत्र पुत्रियाँ कहलाने लगे.
चमकौर के युद्ध में मुग़ल सरहिंद के सूबेदार वज़ीर खान की विशालकाय सेना से लड़ते हुये, गुरु गोबिंद सिंह जी के बड़े दोनों बेटे शहीद हो गए तथा गुरु के दोनों छोटे साहेबजादे और गुरुमाता को वज़ीर खान ने गंगू पंडित की गुरु गोबिंद सिंह से गद्दारी के कारण पकड़ लिया. गंगू पंडित, गुरु गोबिंद सिंह जी का ही रसोईया था. प्राण बचाने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों बच्चो को इस्लाम धर्म स्वीकार करने का विकल्प दिया गया. जिसे दोनो ने अस्वीकार कर दिया. जिसके कारण गुरु गोबिंद सिंह के इन देशभक्त बच्चों को मात्र ग्यारह और आठ साल की उम्र में दीवार में जिन्दा चिंनवा दिया गया. जिससे दम घुटने से इनकी मृत्यु हो गयी.
सिखो के दसवे गुरु गोबिंद सिंह के चारो बेटे शहीद हो चुके थे, जिसके बाद करतारपुर में कई सिख, खुद को गुरु होने का दावा करने लगे थे. सोढी वंशकों ने आदि ग्रंथ पर भी अपना कब्जा कर लिया था. ऐसे में गुरु गोबिंद सिंह साहिब ने दशम ग्रंथ की रचना की और आदि ग्रंथ को सोढियों के कब्जे से मुक्त करवाया. गुरु गोबिंद सिंह जी ने स्थिति को भांप लिया और ग्रंथ साहिब को ही उनके बाद गुरु मानने की घोषणा कर दी. इसीलिए इसके बाद से सिखों ने ग्रंथ साहिब को ही अपना गुरु माना.
ग्रंथ साहिब में मानवता को रास्ता दिखाने, प्रेम, श्रद्धा, बलिदान, परमात्मा को पाने के दिशा-निर्देश दिए गए हैं.
7 अक्टूबर 1708 में एक हमले में गुरु गोबिंद सिंह जी गंभीर रूप से घायल हो गए, इस चोट से गुरु साहिब उभर ही रहे थे, कि नवाब वजीर खान ने अपने दो आदमियों को गुरु गोबिंद सिंह की हत्या का आदेश देकर भेजा तथा गुरु पर हमला करा दिया जिससे उनका घाव खुल गया और फिर भर नहीं पाया जिससे उनकी मृत्यु हो गई.
शांतिप्रिय ढंग से गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिख पंथ के सैनिक शक्ति को मजबूत बनाया, जिससे वे मुगलों का सामना कर सके. इन्होने ही अपने पंथ का नाम खालसा रखा और एकता का सन्देश दिया. इन्होने सिख समुदाय को केश, कच्छ, कड़ा, कृपाण और कंघा इन पांच वस्तुओं को धारण करना आवश्यक कर दिया.
गुरु गोविंद सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 को धार्मिक प्रथाओं को औपचारिक रूप दिया था. यह धर्म खालसा का आदेश देता है, जो लगभग 300 वर्षों का शक्तिशाली इतिहास रखता है. गुरु नानक देव जी ने अपने समय के भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, जर्जर रूढ़ियों और पाखण्डों को भी दूर किया था.
गुरु गोबिंद सिंह जी ने पाहुल प्रथा का भी आरम्भ किया था, जिसका उद्देश्य जातिवाद को दूर करना था. इसमें सभी लोग एक ही कटोरे में प्रसाद ग्रहण करते थे, धर्म की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना पूरा परिवार बलिदान कर दिया. गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा वीरता से भरी इन पंक्तियों का सन्देश आज भी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है –
सवा लाख से एक लड़ाऊं, चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊं, तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं......