इन्फोसिस लिमिटेड की संस्थापक नागवारा रामाराव नारायण मूर्ति थे. इंफोसिस नामक विचार की उत्पत्ति जनवरी 1981 की एक सुबह एन आर नारायण मूर्ति और उनके छह सहयोगीयों की एक आपसी बहस से हुई. दरसअल उस दिन अपार्टमेंट में बैठकर ये सभी विचार मंथन कर रहे थे कि सॉफ्टवेयर कोड लिखने के लिए एक कंपनी कैसे बनायी जा सकती है.
नारायण मूर्ति जो इनफ़ोसिस की रीढ़ रहे है हालांकि किसी बहुत बड़े प्रसिद्ध इंजीनियरिंग कॉलेज से नहीं पढ़े थे. वैसे तो वह IIT में प्रवेश ले चुके थे, मगर उनके पिता नारायण की पढ़ाई आई आई टी से कराने में वित्तीय समस्याओं के चलते असमर्थ थे, और इस वजह से नारायण मूर्ति ने मैसूर के एक स्थानीय इंजीनियरिंग कालेज से पढ़ाई की.
दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास से भरे नारायण मूर्ति पहले से ही जीवन में कुछ महान करने का लक्ष्य पाले थे। किसी प्राइवेट कंपनी में एक कर्मचारी के तौर पे काम करने के बाद, उन्होंने अपने छह सहयोगियों के साथ मिलकर, अपनी कंपनी शुरू करने का निर्णय लिया। उस समय भारत में प्रौद्योगिकी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं थी.
नारायण मूर्ति का लक्ष्य इन्फोसिस के जरिये अमेरिकी बाजार में अपना प्रभाव बनाने का था. हालांकि जिस समय वह एक सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू करने जा रहे थे तब उनके पास एक कंप्यूटर भी उपलब्ध नहीं था। इन्फोसिस नामक यह कंपनी 10,000 रुपये की शुरुआती पूंजी निवेश के साथ शुरू हुई थी और इसको शुरूआत में इंफोसिस कंसल्टेंट्स नाम दिया गया.
नारायण मूर्ति ने अपनी पत्नी सुधा मूर्ति से इन्फोसिस की शुरुआत करने के लिए पैसे उधार लिये थे. उनके घर का आगे का कमरा कंपनी का पहला कार्यालय बनाया गया था.
अमेरिकी बाजार को ध्यान में रखकर बनायीं गयी कंपनी को पहली बड़ी सफलता 1983 में हाथ लगी जब, इन्फोसिस को अमेरिका से अपना पहला क्लाइंट, डेटा बेसिक्स कॉर्पोरेशन मिला। इस मौके को भुनाने में इन्फोसिस ने कोई चूक नहीं की और जल्द ही यह बैंगलोर शिफ्ट हो गई. इस प्रोजेक्ट के बाद ही 1983 में इन्फोसिस में पहला मिनी कंप्यूटर लाया गया. इंफोसिस के शुरूआती सालों में कम्पनी की व्यवस्था सुचारू नहीं थी, इसके अधिकांश संस्थापक सदस्य खुद कोड लिखने में लगे थे.
अपने शुरूआती लक्ष्य अमेरिकी बाजार में प्रभाव के लिए पहले कदम के बाद इन्फोसिस को अमेरिका में कंपनी के लिए मार्केटिंग को संभालने के लिए कर्ट सैल्मन एसोसिएट्स के रूप में अपनी दूसरी सफलता मिली, और अपने लिए पहला संयुक्त उद्यम साझेदार. हालांकि सबकुछ अनुमान के मुताबिक और उतना सीधा सरल नहीं रहा जितना सोचा गया था. सन 1989 में यह संयुक्त उद्यम ढह गया, जिसके आगोश में इंफोसिस भी आ गयी.
एक कंपनी को चलाने की भरसक कोशिश और जी तोड़ मेहनत के आठ साल बाद भी इन लोगो के पास कुछ नहीं था. एक संस्थापक सदस्य बताते है कि उनके साथ पढ़ने वालों के पास में कार और घर थे, केएसए संयुक्त उद्यम के ढह जाने से इंफोसिस को अपने कार्यकाल के पहले संकट का सामना करना पड़ा.
लेकिन नारायण मूर्ति अलग ही मिटटी के बने थे, अपने साहस और हार ना मानने वाले जज्बे से सराबोर मूर्ति ने अपने साथियों से उस समय साफ़ कह दिया था, कि अगर आप लोग जाना चाहते हैं, तो आप जा सकते हैं. लेकिन मैं नहीं हटूंगा और इसे आगे बढ़ाऊंगा. अन्य भागीदारों में नीलेकणी, गोपालकृष्णन, शिबूलाल, दिनेश और राघवन ने उनके जज्बे को देखते हुए साथ रहने का फैसला किया और फिर जो हुआ वह आज एक इतिहास है.
नेसडेक पर लिस्ट होने वाली इन्फोसिस पहली भारतीय कंपनी बनी थी और जब इन्फोसिस ने अपने कर्मचारियों को स्टॉक विकल्प प्रदान करने का निर्णय लिया तो इसने अच्छे बड़ी बड़ी कंपनियों को हैरत में डाल दिया.
अमेरिका से अपने राजस्व का लगभग दो-तिहाई हिस्सा लेने वाली इन्फोसिस, रिबॉक, वीज़ा, बोइंग और न्यूयॉर्क लाइफ जैसे बड़े कॉर्पोरेट कस्टमर्स को सर्व करती है. इन्फोसिस भारत में सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली सबसे बड़ी आईटी सेवा निर्यातक कंपनी है.
सुधा मूर्ति के अनुसार, नारायण मूर्ति के पास हमेशा ही पैसो की कमी रहती थी, वो हमेशा उनके दिए पैसो पर चलती थी. उन्होंने अपनी एक किताब में लिखा था, तीन सालों तक, मैंने अपने लिए मूर्ति के कर्ज को बनाए रखा. नारायण ने कभी पैसे नहीं लौटाए और मैंने आखिरकार हमारी शादी के बाद इसे समाप्त कर दिया, यह राशि 4,000 रुपये से कुछ ज्यादा थी.
सन 2023 में इंफोसिस द्वारा अपने एंप्लाइज को 2015 स्टॉक इंसेंटिव कॉम्पनसेशन प्लान के अनुसार इक्विटी शेयर जारी करने का निर्णय कंपनी में टैलेंटेड और महत्वपूर्ण एंप्लाइज को बनाये रखने के लिए लिया गया. ऐसा ही कुछ इन्फोसिस पहले भी कर चुकी थी इस प्लान के जरिये कम्पनी अपने कर्मचारियों को न केवल पर्सनल ग्रोथ बल्कि कंपनी की ग्रोथ के रेश्यो से भी जोड़ना चाहती है. जिससे दोनों का प्रदर्शन बेहतर हो सके. इस इक्विटी शेयर अलॉटमेंट के माध्यम से न केवल एंप्लाइज की परफॉरमेंस को रिवॉर्ड किया गया बल्कि कंपनी की ग्रोथ का एक हिस्सा उनको ओनरशिप के रूप में दिया गया.
कंपनी का मानना है कि ऐसा करने से कर्मचारियों के रूप में उन्हें संस्थान की हितों की भी फ़िक्र होगी और इसका अच्छा असर देखने को मिलेगा.