अश्विन मास में शारदीय नवरात्र के बाद आने वाली पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता हैं. शरद पूर्णिमा को देव दीपावली, त्रिपुरारी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा और कोजागिरी पूर्णिमा आदि नामों से भी जाना जाता है.
शरद पूर्णिमा पर्व का हिन्दू धर्म में एक विशेष महत्व माना गया है, अश्विन मास की इसी पूर्णिमा तिथि से शरद ऋतु का आरम्भ होता है. इस दिन चन्द्रमा अपनी संपूर्ण और सोलह कलाओं से युक्त होता है. शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, इसलिए उसकी किरणें बहुत ही प्रखर और चमकीली होती हैं. शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा की ये अद्भुत किरणें धरती के लोगों के लिए कई मायनों में प्रभावकारी और लाभदायक होती है.
शरद पूर्णिमा एक बहुत महत्वपूर्ण तिथि है, इसे कोजागर व्रत या कौमुदी व्रत के नाम से भी जाना जाता है और कहते हैं कि इस दिन व्रत रखने से सभी मनोरथ पूर्ण होते है, तथा व्यक्ति के सभी दुख दूर होते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली विवाहित स्त्रियों को व्रत रखने पर संतान की प्राप्ति होती है. जो माताएं अपने बच्चों के लिए कौमुदी व्रत रखती है, उनकी संतान दीर्घायु होती है. अगर कुंवारी कन्याएं शरद पूर्णिमा के दिन व्रत रखती हैं तो उन्हें मनवांछित, सुयोग्य और उत्तम वर की प्राप्ति होती है.
ऐसी मान्यता है कि इस शरद पूर्णमा को चन्द्रमा से आसमान मे अमृत की वर्षा होती है जो धन, प्रेम और सेहत तीनों प्रदान करती है. प्रेम और सभी कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण भगवान श्री कृष्ण ने इसी दिन महारास भी रचाया था.
चंद्रमा की किरणों में इस दिन तेज बहुत होता है जिससे मनुष्य की आध्यात्मिक, शारीरिक और बौद्धिक शक्तियों का विकास होता है, साथ ही चंद्रमा के प्रकाश में इस शरद पूर्णिमा के दिन असाध्य रोगों को दूर करने के औषधीय गुण होते है. इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत बरसता है, इसीलिए इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है.
शरद पूर्णिमा व्रत कथा -
शरद पूर्णिमा व्रत कथा के अनुसार एक साहूकार के दो पुत्रियां थी और दोनो पुत्रियाँ पूर्णिमा का व्रत रखती थी. लेकिन बडी पुत्री तो पूरा व्रत करती थी, मगर छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी. इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री ने शादी के बाद जब संतान पैदा करनी चाही तो उसकी सन्तान पैदा ही मर जाती थी. उसने जब पंडित पुरोहितों से इसका कारण पूछा, तो उन्होने बताया कि तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है. पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है.
तब साहूकार की छोटी बेटी ने पंडितों के बताये अनुसार, पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया. इसके बाद उसको एक पुत्र पैदा हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया. उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से कपडा ढक दिया. फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया. बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया, बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा. बडी बहन बोली- तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी. मेरे बैठने से यह मर जाता, तब छोटी बहन बोली, यह तो पहले से मरा हुआ था, तेरे ही भाग्य से तो यह जीवित हो गया है. तेरे पुण्य से ही मेरा यह मरा हुआ बीटा जीवित हुआ है. उसके बाद साहूकार की छोटी बेटी ने नगर में पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया.
शरद पूर्णिमा व्रत का विधि विधान :-
शरद पूर्णिमा के दिन मनुष्य को विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखना चाहिए और दिनभर जितेन्द्रिय भाव से जुड़े रहे.
धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी जी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए 100 दीपक जलाए. इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें. जब एक प्रहर लगभग घंटे बीत जाएँ, तब लक्ष्मी जी को ये सारी खीर प्रसाद स्वरुप अर्पण करें.
तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएं और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें. तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मी जी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें. शरद पूर्णिमा की इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि देखती हूँ, इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है. जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन-धान्य दूँगी.
इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मी जी को संतुष्ट करने वाला होता है. इससे प्रसन्न हुई माँ लक्ष्मी इस लोक में तो मनुष्य को वैभव, धन, सम्पन्नता और समृद्धि देती ही हैं साथ ही नश्वर शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं.