सनातन धर्म एवं संस्कृति में सावन माह का विशेष धार्मिक महत्त्व है सावन शब्द संस्कृत भाषा के श्रावण शब्द से बना है. श्रावण शब्द की उत्पत्ति श्रवण शब्द से जुड़ी हुई है. श्रवण का अर्थ होता है सुनना, प्राचीन काल में रोज वेदो का श्रवण किया जाता था. परन्तु धीरे-धीरे जब मनुष्यों में यह नित्य कर्म घट गया तो यह निश्चित किया गया कि वर्षा ऋतु में सभी लोग वेदो का श्रवण अवश्य ही करेंगे. इस तरह सावन या श्रावण का महीना अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण बन गया.
सावन माह है शिव को अति प्रिय
सावन माह के बारे में एक पौराणिक कथा है कि महादेव की पहली पत्नी देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था. अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने राजा हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया और इनका नाम पार्वती रखा गया. युवा होने पर देवी पार्वती ने सावन महीने में ही निराहार रह कर कठोर व्रत किया और भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे विवाह किया, जिसके बाद महादेव के लिए सावन माह विशेष हो गया.
पौराणिक कथाओं में एक वर्णन यह भी आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था. जिसमे हलाहल नाम का विष निकला, जिसे महादेव ने कंठ में समाहित करके सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीला हो गया और विष के प्रभाव से महादेव के कंठ में तेज जलन हुई. तब विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया. कंठ नीला हो जाने के कारण ही उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा. इसीलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है. यही वजह है कि श्रावण मास में महादेव को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में अराधना का उत्तमोत्तम फल मिलता है, इसमें कोई संशय नहीं है.
शास्त्रों के अनुसार, सावन महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व महादेव ले लेते हैं. इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं तथा ये समय भक्तों, साधु-संतों सभी के लिए अमूल्य होता है. महादेव को प्रसन करके मन चाहा वरदान पाने का सावन सर्वोत्तम माह है.