राजदंड संगोल या राजदंड संगोल जिसे भारत में एक कानूनी उपकरण माना जाता है. वास्तव में, यह राजद्रोह अधिनियम (संगोल) के लिए जाना जाता है. राजदंड संगोल जिसका अर्थ संघर्ष या लड़ाई का नियम होता है एक कानूनी उपकरण है, जो भारतीय संविधान के अंतर्गत राजद्रोह के विषयों को संगठित रूप से कण्ट्रोल करने के लिए बनाया गया है. इसका उपयोग देश की सिक्योरिटी और यूनिफॉर्मिटी सुरक्षित रखने के उद्देश्य से किया जाता है.
राजदंड संगोल में, राजद्रोह का अपराध करने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाती है और उन्हें उचित रूप से दंडित किया जाता है. यही नहीं जब आपराधिक कार्रवाई का सामरिक मायने होता है, तो यह नेशनल सिक्योरिटी की मान्यता को मजबूती देने के लिए अत्याधिक दंडों के उपयोग द्वारा अनुशासन प्रदान कराता है.
संगोल उपकरण को व्यापक सुधारों की पुनरावृत्ति के लिए संशोधित और अद्यतित किया गया है ताकि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन न करें और इसका उपयोग ईमानदारी के साथ केवल वास्तविक एंटी नेशनल एक्टिविटीज के अगेंस्ट किया जा सके.
चोल शासकों ने नौ वीं शताब्दी से तेरह वीं शताब्दी के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की. इस कालखंड को शासन व्यवस्था के हिसाब से एक गोल्डन पीरियड माना गया. इस टाइम पीरियड में साउथ इंडिया में मंदिरों का निर्माण (बृहदेश्वर मंदिर प्रमुख) और सुदृण अर्थव्यवस्था थी. इन दिनों में राजकाज को न्याय एवम विधि पूर्वक चलाने के लिए प्रतीकात्मक संगोल से राजा को भारित किया जाता था.
संगोल न्याय विधि स्थापना का प्रतीक था, 2023 में नई संसद में संगोल स्थापना से लोकसभा अध्यक्ष को अपने दायित्व को न्याय और विधिपूर्वक निभाने के लिए प्रेरित किया गया. 2023 में जब नई संसद में इसकी स्थापना की गयी तो भारत में अपनी गौरवशाली परम्परा के अंतर्गत आदान प्रदान किये जाते रहे राजचिन्ह संगोल की चर्चा चारो और होने लगी. इसके विषय में डिटेल्स को जानकर लोग हैरान और आश्चर्यचकित है कि ये आजतक कहाँ था. भारतीय समाज प्रसन्नता के अतिरेक से आह्लादित है और समझ रही है कि षड्यंत्रों के तहत इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को छिपा कर कुछ और ही दिखाया गया.
संगोल सोने की परत चढ़ा हुआ राजदंड है, जिसकी लंबाई लगभग 5 फीट (1.5 मीटर) है इसका मेन पोर्सन चांदी से बना हुआ है. संगोल को बनाने में 800 ग्राम (1.8 पौंड) सोने का प्रयोग किया गया था. काफी कॉम्प्लेक्स डिजाइनों की सहायता से इसको सजाया गया है और टॉप पर महादेव के वाहन नंदी की नक्काशी की गई है.
नंदी को हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान दिया गया है. इसको धर्म के प्रतीक के रूप में दर्शाया जाता है, जिसे पुराणों में एक वृषभ बैल के रूप में प्रदर्शित किया गया है. नंदी की प्रतिमा संगोल का शैव परंपरा से जुड़ाव दिखाती है. हिंदू व शैव परंपरा में नंदी को समर्पण का प्रतीक माना गया है. यह समर्पण राजा और प्रजा दोनों का राज्य के प्रति समर्पित होने का वचन है.
शिव मंदिरों में नंदी को हमेशा शिव के सामने स्थिर मुद्रा में बैठे दिखाया जाता हैं. हिंदू मान्यताओं में ब्रह्मांड की परिकल्पना शिवलिंग से की जाती रही है. इस कांसेप्ट में नंदी की स्थिरता शासन के प्रति अडिग होने का प्रतीक है.
इसके अलावा संगोल में नंदी के नीचे वाले भाग में देवी लक्ष्मी व उनके आस-पास हरियाली के तौर पर फूल-पत्तियां, बेल-बूटे उकेरे गए हैं, जो कि राज्य की संपन्नता को दर्शाती हैं. सन 1947 के सत्ता हस्तांतरण में जिस संगोल या राजदंड का इस्तेमाल हुआ था उसे पहली बार अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ही ग्रहण किया था.