ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रुप से सुहागन महिलाओं को जरूर रखना चाहिए रजस्वला धर्म में जाने अनजाने उससे जो भी पाप हो जाते हैं. उनकी शुद्धि के लिए ऋषि पंचमी व्रत करना उत्तम है. ऋषि पंचमी का व्रत करने से महिलाओं को संसार के सभी सुखों की प्राप्ति होती है. इस दिन महिलाओं को व्रत का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए भविष्य पुराण में वर्णित ऋषि पंचमी की कथा का पाठ जरुर करना चाहिए। तभी उनका व्रत पूर्ण होगा.
इसी विषय में एक प्राचीन कथा है, सतयुग में विदर्भ नगरी में स्येनजित नामक राजा थे. वे प्रजा को पुत्र के सामान मानते थे. उनके आचरण एक ऋषि के समान थे, उनके राज्य में बड़े ज्ञानी वेदों सुमित्र नामक एक कृषक ब्राह्मण निवास करते थे.
सुमित्र की पत्नी जयश्री एक पतिव्रता स्त्री थी ब्राह्मण के अनेक नौकर-चाकर भी थे. एक समय वर्षा काल में जब उनकी पत्नी खेती के कामों लगी हुई थी. तब वह रजस्वला भी हो गई उसे अपने रजस्वला होने का भास हो गया, किन्तु फिर भी वह घर गृहस्थी के कार्यों में ही लगी रहीजो शास्त्रों के अनुसार पाप होता है. कुछ समय के पश्चात दोनों स्त्री पुरुष अपनी-अपनी आयु भोगकर मृत्यु को प्राप्त हो गए,अगले जन्म में जय श्री अपने ऋतु दोष के कारण कुतिया बनी और सुमित को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में रहने के कारण बैल की योनी प्राप्त हुई. सिर्फ ऋतु दोष के आलावा इन दोनों ने अपने जीवन में कोई और पाप नहीं था. इस कारण अगले जन्म में भी इन दानों को अपने पूर्वजन्म का समस्त विवरण याद था. वे दानों कुतिया और बैल के रूप में रहकर अपने पुत्र सुमित के घर में ही पलने लगे सुमित भी बहुत धर्मात्मा था और अतिथियों का पूर्ण सत्कार किया करता था. अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने अपने घर ब्राह्मण को जिमाने के लिए नाना प्रकार के भोजन बनवाये.
सुमित की स्त्री किसी काम से बाहर रसोई घर से बाहर गई हुई थी, कि तब ही एक सर्प कही से आया तथा खीर के बर्तन में विष उडेल दिया. सुमित की मां जो एक कुतिया के रूप में बैठी हुई, उसने जब यह सब देखा तो सोचा इस विष वाले बर्तनो में खाना खा कर अगर ब्राह्मणो की मृत्यु हो गई, तो मेरे पुत्र को ब्रह्महत्या के पाप लगेगा अतः उसने अपने पुत्र को ब्रह्महत्या के पाप से बचाने की इच्छा से उस बर्तन को स्पर्श कर लिया. सुमित की पत्नी ने जब कुतिया को बर्तन को स्पर्श करते देखा तो उसने एक जलती लकड़ी कुतिया के मारी और क्रोध के कारण सारे दिन उस कुटिया को भोजन नहीं दिया. भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया अपने पूर्व पति के पास आकर बोली- हे नाथ, आज मैं भूख से मरी जा रही हूं वैसे तो रोज ही मेरा पुत्र खाने को देता था मगर आज उसने कुछ नहीं दिया उसने अपने पति को सुबह की साडी घटना बताई. तब बैल ने कहा-है भद्रे, तेरे ही पापों के कारण मैं भी इस योनि में आ पड़ा हू, बोझा ढोते ढोते मेरी कमर टूट गयी है. आज मैं भी दिन भर खेत जोतता रहा, हमारे पुत्र ने आज मुझे भी भोजन नहीं दिया और ऊपर से मारा भी खूब है. मुझे कष्ट देकर श्राद्ध को व्यर्थ ही किया है. अपने माता पिता की इन बातों को उनके पुत्र सुमित ने सुन लिया उसे बहुत दुःख हुआ. उसने उसी समय जाकर उनको भर पेट भोजन कराया और उनके दुःख से दुखी होकर वन में जाकर उसने ऋषियों से पूछा-हे स्वामी! मेरे माता पिता ने तो सदा ही सत्कर्म किये थे. फिर किन कर्मों के कारण उनको यह योनि प्राप्त हुई है और मै किस प्रकार उन्हें इससे छुटकारा दिला सकता हूँ. सुमित के दुःख भरे वचनो को सुनकर सर्वतपा नामक एक महर्षि दया करके बोले,पूर्व जन्म में तुम्हारी माता ने रजस्वला होते हुए भी घर गृहस्थी की समस्त वस्तुओं को स्पर्श किया था और तुम्हारे पिता ने उसको स्पर्श किया था. इसी कारण वे कुतिया और बैल की योनि को प्राप्त हुए हैं.
तुम उन की मुक्ति के लिए भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष पंचमी को ऋषि पंचमी का व्रत करो. महर्षि सर्वतपा के इन वचनों को सुनकर सुमित अपने घर लौट आया और ऋषि पंचमी का दिन आने पर उसने अपनी स्त्री सहित उस व्रत को धारण किया और उस के पुण्य को अपने माता पिता को दे दिया. इस व्रत के प्रभाव से उसके माता-पिता दोनों ही पशु योनियों से मुक्त हो गए और स्वर्ग को चले गए जो स्त्री इस व्रत को धारण करती है वह समस्त सुखों को पाती है.