ऋषि पंचमी का व्रत हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है. इस त्यौहार में सप्त ऋषियों के प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त किया जाता है. ऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद मनाई जाती है.
ऋषि पंचमी व्रत का पालन करने वाली स्त्री सभी पापो से मुक्त हो जाती है. यह व्रत पति भी अपनी पत्नी के लिए कर सकते है.
ऋषि पंचमी से जुडी कथा के अनुसार, वृत्रासुर का वध करने के कारण इन्द्र के उस पाप को चार भागो में बांट दिया गया, जिसका पहला भाग अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों के बरसाती जल में, तीसरा पर्वतों में और चौथा स्त्री के रज में था.
स्त्री द्वारा रजस्वला धर्म में जाने अनजाने से जो भी पाप हो जाते हैं. उनकी शुद्धि के लिए ऋषि पंचमी व्रत करना उत्तम है. यह व्रत समान रूप से सभी चारों वर्णों की स्त्रियों द्वारा किये जा सकते है.
सप्त ऋषियों, ऋषि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ जी को समर्पित, ऋषि पंचमी व्रत में प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन कर अपने घर में भूमि पर चौक बना कर सप्त ऋषियों की स्थापना की जाती है. उसके बाद श्रद्धा पूर्वक सुगंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सप्तर्षियों का पूजन किया जाता है.
स्त्रियों को यह ऋषि पंचमी व्रत लगातार सात वर्षों तक करना चाहिए