महान संतों से भरी इस भारत भूमि में संतों की विशेष महत्ता है, संत यहाँ सभी के लिए श्रद्धेय होते हैं और इन महान संतों की वजह से ही यह भारतीय संस्कृति और समाज जीवित है. योगियों में चमत्कारी गुणों के किस्से और कहानियां भारत में कोई बड़ी बात नहीं है और भारत के लोगों को इन बातों पर कभी भी आश्चर्य नहीं होता. मगर विज्ञान इन बातों को कभी भी स्वीकार ही नही करता है.
ऐसे ही एक दिव्य संत थे संत प्रहलाद जानी जिन्हे लोग चुनरी वाले माताजी भी कहते थे. संत प्रहलाद जानी अरवल्ली स्थित शक्तिपीठ अंबाजी के निकट गब्बर पर्वत की तलहटी में रहते थे. प्रहलाद जानी ने महज 10 साल की आयु में ही घर त्याग दिया था और सन्यास धारण कर लिया था और फिर भगवती अंबाजी के साक्षातकार होने के बाद उन्होंने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया था.
विज्ञान के लिए भी एक बड़ी मिस्ट्री बने रहे प्रहलाद जानी की सबसे अमेजिंग बात यह थी कि उन्होंने लगभग 79 वर्षों से कुछ भी नहीं खाया पीया था और उन्हें ऊर्जा ध्यान करने से प्रकृति के द्वारा प्राप्त होती थी. इनका भोजन सूर्य की रोशनी और वायु ही थे. वह प्रत्येक दिन छत पर जाते थे और आंखें बंद करके योग व ध्यान के माध्यम से सूर्य की रोशनी और वायु से सभी आवश्यक तत्व साँसों के जरिये ग्रहण कर लेते थे.
संत प्रहलाद जानी का कहना था कि हवा में और रोशनी में अनेक तत्व मौजूद होते हैं. किन्तु हम इसे सिर्फ सांस लेने वाली ऑक्सीजन ही समझते हैं. हालांकि इन तत्वों को ग्रहण कर पाना बहुत लंबे और कठिन अभ्यास के बाद ही सम्भव होता है.
प्रहलाद जानी मेडिकल रिसर्च के लिए एक रियल मिस्ट्री थे या फिर वह कोई ड्रामा करते थे, इस बात की जांच करने के लिए सन 2010 में अहमदाबाद के डॉक्टर्स की टीम के द्वारा रिसर्च भी की गयी थी. जिसका लाइव टेलीकास्ट पूरी तरह से डिस्कवरी चैनल पर भी किया गया था.
इस रिसर्च के रिजल्ट्स काफी सर्पेराइजिंग थे. यह रिसर्च लगभग 15 दिनों तक चली. जिसमें प्रहलाद जानी को टेस्ट के लिए स्टर्लिंग हॉस्पिटल में रखा गया था. इस टेस्ट के समय लगातार 24 घंटे उनके उपर सीसीटीवी से निगरानी की गयी, उनका एम आर आई, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे किया गया साथ ही उन पर क्लीनिकल और बायोकेमिकल एक्सपेरिमेंट्स भी किए गए थे. यहां तक कि उनके आश्रम के पेड़-पौधों का भी टेस्ट किया.
इस 15 दिनों के टेस्ट में प्रहलाद जानी ने एक बार भी ना कुछ खाया ना ही कुछ पिया यहाँ तक कि इस दौरान उन्होंने मल मूत्र का त्याग भी नहीं किया. डॉक्टर्स की टीम अंत तक कोई फाइनल रिजल्ट नहीं निकाल सकी और फिर उन्होंने संत प्रहलाद जानी को विदेश ले जाने की मांग की मगर उन्होंने मना कर दिया.
संत प्रहलाद जानी उम्र के आठवें दशक में भी नियमित रूप से योग और ध्यान किया करते थे.