osho the great indian philosopher and spiritual guru

ओशो द ग्रेट इंडियन फिलोसोफर एंड स्परिचुअल गुरु

ओशो का मूल नाम रजनीश है हालांकि बालयकाल में उन्हें चंद्र मोहन जैन नाम दिया गया था. ओशो का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को भारत के मध्य प्रदेश राज्य में रायसेन शहर के कुच्वाडा गांव में हुआ. हुआ था. अपने पिता की ग्यारह संतानो में ओशो सबसे बड़े थे. उनकी माता सरस्वती जैन और पिता श्री बाबूलाल तारणपंथी दिगंबर जैन थे. 

ओशो एक विख्यात भारतीय विचारक, धर्मगुरु और रजनीश आंदोलन के सूत्रधार थे. ओशो का जीवनकाल एक कंट्रोवर्सियल, मिस्टीरियस, गुरु या स्पीरिचुअल टीचर का रहा. ओशो धार्मिक रूढ़िवादिता के बहुत बड़े आलोचक थे, उनके इस नजरिये ने उन्हें अति शीघ्र कॉन्ट्रोवर्सियल बना दिया. ओशो अपनी लीक से हटकर सोच की वजह से आजीवन विवादित बने रहे. 

ओशो समाजवाद से लेकर महात्मा गाँधी तक की आलोचना खुले आम करते थे. यही नहीं ओशो ने हिंदू धार्मिक रूढ़िवाद तक की बड़ी प्रखरता से आलोचना की.

उन्होंने मानव कामुकता को स्वाभाविक बताते हुए इसको दबाने के बजाय एक ज्यादा खुला रवैया अपनाये जाने की बात कही. ओशो के इस नजरिये की न केवल भारत बल्कि पश्चिमी देशों में भी बड़ी आलोचना हुई, हालांकि बाद में ओशो का यह मुक्त व्यवस्था का दृष्टिकोण काफी बड़े समूह द्वारा स्वीकार्य किया  गया.

ओशो ने शुरूआती 7 साल तक अपना बचपन अपने ननिहाल में जिया. जिसे ओशो अपने विकास का प्रमुख हिस्सा मानते थे क्योंकि उनकी नानी ने ओशो को पूरी स्वतंत्रता और  उन्मुक्तता प्रदान की तथा रुढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा. जिस समय ओशो 7 वर्ष के थे तब उनके नाना का निधन हो गया जिसके बाद वह गाडरवारा अपने माता पिता के साथ रहने आ गए. 

बचपन से ही ओशो का व्यक्तित्व गंभीर व स्वभाव सरल था, उनकी प्राथमिक शिक्षा सरकार द्वारा संचालित आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हुई, स्टूडेंट लाइफ में ही रजनीश कंट्राडिक्टरी विचार रखने वाले व्यक्ति हुआ करते थे. उन्हें परंपरागत तरीके समझ नहीं आते थे.

किशोरावस्था तक आते-आते ओशो नास्तिक बन गए थे, उन्हें ईश्वर और आस्तिकता में बिलकुल विश्वास नहीं था. अपनी स्टूडेंट लाइफ में ही उन्होंने एक कुशल वक्ता और तर्क वादी व्यक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर लिया था. किशोरावस्था में ही ओशो कुछ समय के लिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े.

ओशो को भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश, केवल रजनीश जैसे नामों से जाना जाता है. ओशो शब्द का अर्थ सागर में विलीन हो जाना होता है. रजनीश के ओशो नाम के शब्द की मूल उत्पत्ति के विषय में तर्क दिए जाते है जिनमें से एक मान्यता के अनुसार, ओशो ने स्वयं ऐसा कहा था कि ओशो शब्द कवि विलयम जेम्स की कविता ओशनिक एक्सपीरियंस के शब्द ओशनिक से लिया गया है. ओशनिक वर्ड का एक मिनिंग एक्सपेरिएंस को एक्सप्लेन करता है, लेकिन एक्सपेरिएंस होल्डर के बारे में क्या.... इसके लिए हम ओशो शब्द का प्रयोग करते हैं अर्थात, सागर से एक हो जाने का अनुभव करने वाला.

1960 के दशक में ओशो आचार्य रजनीश के नाम से, 1970 और 1980 के दशक में भगवान श्री रजनीश के नाम से और बाद में 1990 के समय से उन्हें ओशो के नाम से पहचाना जाने लगा. 

ओशो ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी जाकर खूब प्रवचन दिये. ओशो ने अपने विचारों का प्रचार मुम्बई में शुरू किया, जिसके बाद, पुणे में उन्होंने  एक आश्रम बनाकर कई तरह के उपचार विधान देने शुरू किये. हालांकि यह सब जल्द उस समय की भारत सरकार द्वारा कुछ डिफरेंसेस के चलते रोक दिया गया, जिसके चलते ओशो को अपना आश्रम अमेरिका के ऑरगन शहर में ट्रांसफर करना पड़ा.

1985 में एक फ़ूड पॉइजनिंग एक्सीडेंट के बाद ओशो को यूनाइटेड स्टेट्स से आउटकास्ट कर दिया गया और 21 अन्य देशों द्वारा उनके लिए रास्ते बंद कर दिए जाने के बाद ओशो फिर से भारत लौट आये और पुणे के अपने आश्रम में अपने जीवन के अंतिम दिन बिताये।।।

मृत्यु के बाद, ओशो का आश्रम, ओशो इंटरनॅशनल मेडिटेशन रेसॉर्ट जूरिक बेस्ड ओशो इंटरनॅशनल फाउंडेशन द्वारा ऑपरेट किया जाता है. ओशो और उनके आश्रम की पॉपुलरिटी उनके निधन के बाद से और अधिक बढ़ गयी.

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