नागपंचमी का पर्व प्रमुख रूप से दक्षिण महाराष्ट्र और बंगाल में मनाया जाता है. भारत देश की अलग-अलग जगहों पर नागपंचमी की पूजा अगल तरीके से की जाती है. केरल में शेषनाग की पूजा होती है. वहीं पश्चिम बंगाल, असम और उड़ीसा में इस दिन नागों की देवी मां मनसा की पूजा की जाती है. उत्तरी भारत में लोग सुबह उठकर घर के आगे या पूजा स्थान पर गोबर से नाग बनाते हैं और उनकी दूध, दूब, कुश, चंदन, अक्षत, फूल आदि से पूजा करते हैं.
ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने और रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं. मान्यता यह भी है कि इस दिन सर्पों की पूजा करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं. प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, अगर किसी जातक की कुंडली में कालसर्प दोष हो तो उसे नागपंचमी के दिन भगवान शिव और नागदेवता की पूजा करनी चाहिए.
एक मान्यता यह भी है कि सर्प ही धन की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं और इन्हें गुप्त, छुपे और गड़े धन की रक्षा करने वाला माना जाता है. नाग, मां लक्ष्मी की रक्षा करते हैं. जो धन की देवी है. इसलिए धन-संपदा व समृद्धि की प्राप्ति के लिए नाग पंचमी मनाई जाती है. इस दिन श्रीया, नाग और ब्रह्म अर्थात शिवलिंग स्वरुप की आराधना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और साधक को धनलक्ष्मी का आशिर्वाद मिलता है.
नागपंचमी को लेकर एक कहानी यह भी प्रचलित है कि भगवान कृष्ण ने उन्हें यह वरदान दिया था कि जो भी जातक नाग देवता को दूध पिलाएगा, उसे जीवन में कभी कष्ट नहीं होगा.
दरअसल, एक बार कालिया नाम के नाग ने प्रतिषोध में पूरी यमुना नदी में विष घोल दिया. इसके बाद यमुना नदी का पानी पीने से बृजवासी बेहोश होने लगे. ऐसे में भगवान कृष्ण ने यमुना नदी के अंदर बैठे कालिया नाग को बाहर निकालकर उससे युद्ध किया. युद्ध में कालिया हार गया और यमुना नदी से उसने अपना सारा विष सोख लिया. भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर कालिया को वरदान दिया और कहा कि सावन के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन नागपंचमी का त्योहार मनाया जाएगा और सर्पों की पूजा की जाएगी जो भी जातक नाग देवता को दूध पिलाएगा, उसे जीवन में कभी कष्ट नहीं होगा.
नागपंचमी मनाने के पीछे कई प्रचलित कहानियां हैं. ऐसी मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला उसे पीने को कोई तैयार नहीं था. अंतत: भगवान शंकर ने उसे पी लिया. भगवान शिव जब विष पी रहे थे, तभी उनके मुख से विष का कुछ बूंद नीचे धरती पर गिरी और सर्प के मुख में समा गई. इसके बाद ही सर्प जाति विषैली हो गई. सर्पदंश से बचने के लिए ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है.
कुछ जातक इस दिन मां सरस्वती की पूजा भी करते हैं. क्यूकि सर्पों में बौद्धिक बल होता है. इसलिए इस दिन सर्पों के साथ मां सरस्वती की भी पूजा की जाती है. घर की सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए भी इस दिन व्रत रखा जाता है. इससे सर्पदंश का भय दूर होता है.