mohun bagan a famous football club

मोहन बागान ए फेमस फुटबॉल क्लब

इंडियन फुटबॉल कल्चर, फुटबॉल की दुनिया में वेल स्टेब्लिशड कुछ देशों से काफी पुराना है. भारत में फुटबॉल कल्चर की शुरुआत 1850 के दशक में मानी जाती है, जब बंगाल के स्थानीय लोगों ने भारत में राज कर रही तत्कालीन ब्रिटिश सेना के जवानों को खेलते हुए देखा था. भारत में फुटबॉल के लिए जागरूकता फैलाने का श्रेय नागेंद्र प्रसाद सर्वधीचारी नामक व्यक्ति को जाता है, जिन्होंने हरे स्कूल के छात्र रहते हुए फुटबॉल को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. नागेंद्र प्रसाद सर्वधीचारी ने 1880 के दशक में वेलिंगटन फुटबॉल क्लब से शुरुआत करते हुए कई फुटबॉल क्लब स्थापित भी किए, इसके बाद, भारत में फुटबॉल लोगों के बीच तेजी से प्रचलित हो गया.

फिर 1880 दशक के अंत में एक महत्वपूर्ण घटना घटी जब, आजकल का कोलकाता में फरियापुकुर लेन के रूप में जाना जाने वाला क्षेत्र, स्थानीय युवाओं ने एक ऐसी जगह के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य से चुना जहाँ वे नियमित रूप से अपना पसंदीदा खेल फुटबॉल खेल सकें. इसी जगह कीर्ति मित्रा के स्वामित्व वाले मोहन बागान विला नामक एक प्रसिद्ध संगमरमर के महल के परिसर को फाइनल किया गया. यही पर एक बैठक आयोजित की गई जिसकी अध्यक्षता जाने-माने वकील भूपेंद्रनाथ बसु ने की थी और भूपेंद्रनाथ बसु के साथ ज्योतिंद्रनाथ बसु नवगठित मोहन बागान क्लब के पहले अध्यक्ष भी बने थे. साथ ही इसी बैठक में क्लब का नाम मोहन बागान स्पोर्टिंग क्लब रखा गया था. 

15 अगस्त, 1889 को मोहन बागान स्पोर्टिंग क्लब की स्थापना करते हुए शायद किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि यही 15 अगस्त, आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता दिवस की तारीख बनेगी. 

मोहन बागान स्पोर्टिंग क्लब के नाम को बाद में एक प्रख्यात प्रोफेसर एफ.जे. रोवे की सिफारिश पर बदलकर मोहन बागान एथलेटिक क्लब कर दिया गया. साथ ही क्लब ने नए सदस्यों का चुनाव करने में कड़े नियमों का पालन किया. अपने शुरुआती चरणों में, मोहन बागान ने अपना पहला टूर्नामेंट, कूचबिहार कप, 1893 में खेला, हालांकि शुरू में कुछ समय तक उन्हें सफलता नहीं मिली.

आखिरकार 1904 में मोहन बागान के लिए ट्रॉफी का सूखा खत्म हो गया जब मोहन बागान ने कूचबिहार कप जीतकर अपनी पहली ट्रॉफी जीती. इस जीत के बाद मोहन बागान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1905 में यह कारनामा एक बार फिर से दोहरा दिया. यही नहीं कूचबिहार के महाराजा खुद मोहन बागान  टीम से प्रभावित होकर इसके मुख्य संरक्षक बन गए. 

1906 में और भी मोहन बागान को कई बड़ी सफलताएँ मिलीं, इस साल कूचबिहार कप के साथ साथ ट्रेड्स कप और ग्लैडस्टोन कप पर भी मोहन बागान ने कब्ज़ा जमा लिया. फिर ट्रेड्स कप की सफलता को 1907 में दोहरा दिया और 1908 में, 1906 की उपलब्धि को उन्हीं तीन ट्रॉफियों के साथ फिर से दोहराया. मोहन बागान उस समय प्रतिष्ठित ट्रेड्स कप में सफलता की हैट्रिक बनाने वाली पहली टीम भी बनी थी.

इसी क्रम में 1909 में मोहन बागान की टीम को उसके लगातार अच्छे प्रदर्शन के लिए सम्मानित भी किया गया और उन्हें आईएफए शील्ड प्रतियोगिता में खेलने के लिए आमंत्रित किया गया. हालांकि, टीम को पहले दो वर्षों में ब्रिटिश रेजिमेंट टीमों से मुकाबला करने में संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अन्य टूर्नामेंटों में मोहन बागान की सफलता निरंतर जारी रही. 1909 में मोहन बागान ने चौथा ट्रेड्स कप जीता तो 1910 में लक्ष्मीबिलास कप, नवाब असनुल्लाह चैलेंज शील्ड और बंगाल जिमखाना शील्ड जीती. लेकिन प्रतिष्ठित आईएफए शील्ड में टीम का संघर्ष अभी भी मैनेजमेंट के लिए एक कांटा बना हुआ था.

जिसका हल निकालने के लिए और आईएफए शील्ड नामक चुनौती से पार पाने के लिए एक महान खिलाड़ी शिबदास भादुड़ी को एक ऐसी टीम बनाने का काम दिया गया जो आईएफए शील्ड खिताब की चुनौती को पार कर सके. उस समय आईएफए शील्ड बहुत बड़ी थी तो मोहन बागान के लिए मायावी बन गयी यह ट्रॉफी हासिल करने का क्रम शुरू हुआ. 

आईएफए शील्ड 2011 का बहुप्रतीक्षित अभियान 10 जुलाई 1911 को शुरू हुआ तो कोलकाता के क्लब मोहन बागान का पहला प्रतिद्वंद्वी सेंट जेवियर्स कॉलेज था. इस मैच में मोहन बागान ने उच्च श्रेणी के प्रतिद्वंद्वियों को 3-0 से हराकर आसानी से जीत दर्ज करते हुए इस साल अपने इरादे स्पष्ट कर दिए. 

अगला मैच प्री-क्वार्टर जो कि 14 जुलाई को रेंजर्स फुटबॉल क्लब से था, में मोहन बागान ने शानदार शुरुआत की और 2-0 से बढ़त बना ली. हालांकि रेंजर्स ने खेल में वापसी करने की कोशिश की और उन्हें तीन पेनल्टी भी मिली, लेकिन मोहन बागान के गोलकीपर हीरालाल मुखर्जी ने अद्भुत प्रदर्शन किया और  तीनो पेनल्टी सेव की. आखिरकार मोहन बागान ने ये मैच 2-1 से जीत लिया. 

​​फिर 19 जुलाई को खेला गया क्वार्टर फाइनल मैच जिसमें मोहन बागान का सामना राइफल ब्रिगेड से हुआ, जिसे 1-0 से जीतकर मोहन बागान सेमीफाइनल में पहुंच गयी. भारतीय फुटबॉल क्लब की प्रगति का घोडा मानो सरपट दौड़ा जा रहा था और 24 जुलाई को अब मोहन बागान का मुकाबला सेमीफाइनल में   मिडलसेक्स रेजिमेंट की मजबूत टीम से होना था. डलहौजी ग्राउंड पर खेले गए इस सेमीफाइनल में काफी अधिक भीड़ जमा हो गई थी. अनुमान के मुताबिक मैच रोमांचक हुआ और पहला गेम 1-1 से बराबरी पर छूटा. 

चूंकि उन दिनों टाई-ब्रेकर नहीं होते थे, इसलिए 26 जुलाई को निर्णय निकालने के लिए फिर से मैच खेला गया. रीप्ले में मोहन बागान ने गजब का करतब दिखाया और के शिबदास भादुड़ी, हबुल सरकार व कानू रॉय के गोलों की बदौलत 3-0 से जबरदस्त जीत दर्ज की. आईएफए फाइनल में पहुंची मोहन बागान की टीम का मुकाबला अब ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट से होना था.

फाइनल मैच ने सभी का ध्यान अपनी और आकर्षित किया, क्योंकि एक भारतीय फुटबाल टीम खिताब के लिए अंग्रेजो से प्रतिस्पर्धा कर रही थी. भारत के स्थानीय लोग अपनी जाति और धर्म से ऊपर उठकर इतिहास रचने की उम्मीद में मोहन बागान को सपोर्ट करने स्टेडियम में उमड़ पड़े थे. 

उस दिन सभी सड़कें मानो कलकत्ता फुटबॉल ग्राउंड की ओर जा रही थीं. यात्रियों की सहायता के लिए विशेष रेलगाड़ियों की व्यवस्था भी की गई थी. आयोजकों का अनुमान था कि आज 80,000 लोगों की संख्या  मैच देखने के एकत्र होगी और वहाँ कोई फुटबॉल गैलरी भी नहीं थी. मगर इतिहासकारों ने लिखा है कि 29 जुलाई 1911 को स्थानीय क्लब मोहन बागान का उत्साहवर्धन करने के लिए उस समय लगभग एक लाख लोग मैदान में आए थे, जो तब बहुत बड़ी संख्या थी. 

आईएफए शील्ड 1911 जीतने के उद्देश्य से ईस्ट यॉर्कशायर की टीम अपनी काली और सफ़ेद जर्सी में उतरी जबकि मोहन बागान ने अपनी प्रतिष्ठित हरी और मैरून शर्ट पहन रखी थी. आईएफए शील्ड ट्राफी 1911 का ये फाइनल मैच शाम 5.30 बजे शुरू हुआ. हालांकि फाइनल मैच की शुरुआत स्थानीय मोहन बागान टीम के लिए ज्यादा अच्छी नहीं रही क्योंकि रेजिमेंटल ईस्ट यॉर्कशायर टीम के लिये जैक्सन ने फ्री-किक से गोल किया और पहले हाफ़ में 1-0 से बढ़त बना ली. साथ ही मोहन बागान के 11 में से 10 खिलाड़ी तब नंगे पैर खेल रहे थे, तो कोलकाता क्लब के लिए यह कोई आसान काम नहीं था, केवल रेवरेंड सुधीर चटर्जी ने ही जूते पहने हुए थे.

इस मैच में उत्साह का ये आलम था कि जो लोग खेल नहीं देख पाए थे, उन्हें स्कोर लिखी पतंगें उड़ाकर सूचित किया जा रहा था. फर्स्ट हाफ में बिछड़ चुकी मोहन बागान ने बहरहाल अपने स्थानीय उत्साही दर्शकों के उत्साह से प्रेरित होकर, दूसरे हाफ में जबरदस्त वापसी करते हुए कप्तान शिबदास भादुड़ी के गोल से बराबरी की और फिर ​सेंटर फॉरवर्ड अविलाश घोष ने मैच के अंतिम क्षणों में खेल समाप्त होने से महज दो मिनट पहले ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट की रक्षा पंक्ति को भेदकर एक शानदार विजयी गोल दाग दिया और मोहन बागान के लिए इतिहास रच दिया. 

इतिहास रच दिया गया था, यह सिर्फ़ मैदान पर जीत नहीं थी, बल्कि भारत की ब्रिटिश हुकुमत के अत्याचारियों पर भी एक प्रतीकात्मक जीत थी. मूलनिवासियों की टीम ने शक्तिशाली अंग्रेजी साम्राज्य को शर्मसार कर दिया था. इस मैच में खेले मोहन बागान के खिलाड़ी अब हीरो थे, उन्हें अमर एकादश के रूप में सम्मानित भी किया गया. 

खिलाड़ियों को उत्साही भारतीयों ने कंधों पर उठाकर मैदान से श्यामबाजार तक घुमाकर जश्न मनाया गया. जश्न में भारतीय लोग धर्म, जाति, पंथ सब भूल गए थे, कहा जाता है कि जब जुलूस फोर्ट विलियम के सामने से गुजर रहा था, तो एक ब्राह्मण ने यूनियन जैक की ओर इशारा करते हुए पूछा था कि आप इसे कब उतारेंगे. जिसका जवाब देते हुए शिबदास भादुड़ी ने कहा था कि जब हम फिर से शील्ड जीतेंगे. ये भी अद्भुत संयोग था कि 1947 में जब भारत ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हुआ और यूनियन जैक की जगह तिरंगा लगा तो दूसरी शील्ड भी भारत ने 1947 में ही जीती थी. 

ऐसे ही दो संयोग भारत और मोहन बागान से जुड़े है, एक है 15 अगस्त 1889 को मोहन बागान की स्थापना और 15 अगस्त को ही भारत की आजादी का स्वतंत्रता दिवस तो दूसरा है भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रंगों से मिलता जुलता मोहन बागान की जर्सी का हरा और मैरून रंग.

29 जुलाई 1911 का दिन बंगाल के साथ-साथ भारतीय फुटबॉल के इतिहास में भी एक गौरवशाली क्षण था, क्योंकि ग्रीन और मरून्स जर्सी पहने मोहन बागान के लडाको ने कई दिग्गज ब्रिटिश क्लबों को हराकर मोहन बागान को प्रतिष्ठित आईएफए शील्ड जीतने वाला पहला भारतीय क्लब बना दिया था. 

भारतीय फुटबाल टीम ने ब्रिटिश टीम के खिलाफ़ नंगे पांव से खेलते हुए निडरता से मैच खेला और भारतीय फ़ुटबॉल के ऐतिहासिक पन्नो में अपना नाम दर्ज करा लिया. इस जीत ने न केवल मोहन बागान के इतिहास को समृद्ध किया, बल्कि इसने उस समय गुलामी से जूझ रहे मूल भारतीयों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बड़े राष्ट्रवाद की भावना भी पैदा कर दी थी.

आईएफए शील्ड 1911 जीतने वाली मोहन बागान की अमर एकादश कुछ इस प्रकार थी -

हीरालाल मुखर्जी (गोल कीपर)

भूति सुकुल (दाएं-पीछे)

सुधीर कुमार चटर्जी (बाएं-पीछे)

मनमोहन मुखर्जी (दाएं-आधे)

राजेंद्रनाथ सेनगुप्ता (केंद्र-आधे)

नीलमाधब भट्टाचार्य (बाएं-आधे)

जतींद्रनाथ रॉय (कानू) (दाएं-आउट) )

श्रीशचंद सरकार (हाबुल) (दाएं-अंदर)

अभिलास घोष (सेंटर-फॉरवर्ड)

बिजयदास भादुड़ी (बाएं-अंदर)

शिबदास भादुड़ी (बाएं-बाहर)

इसके बाद क्लब को सार्वभौमिक ख्यति और प्रशंसा मिली. मैनचेस्टर गार्डियन ने 4 अगस्त को अपने लेख में लिखा भी, कि बंगालियों की एक टीम ने एक लाख देशवासियों की तालियों के बीच तीन ब्रिटिश रेजिमेंटों की बेहतरीन टीमों को हराकर भारत में फुटबॉल एसोसिएशन शील्ड जीती. बेशक, इसमें हैरान होने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि एसोसिएशन फ़ुटबॉल की जीत सबसे अच्छी शारीरिक फिटनेस, सबसे तेज़ नज़र और सबसे तेज़ बुद्धि वाली टीम को ही मिलती है. 

मोहन बागान की पहली आईएफए शील्ड जीत निस्संदेह क्लब के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है. यही वजह है कि इसे आज भी बड़े गर्व और सम्मान के साथ याद किया जाता है. उत्तरी कोलकाता में एक सड़क का नाम भी अमर एकादश के खिलाडी शिबदास भादुड़ी के नाम पर रखा गया है.

सन 1911 में ब्रिटिश टीम ईस्ट यॉर्कशायर पर मोहन बागान की आईएफए शील्ड जीत का जश्न मोहन बागान क्लब द्वारा आज भी हर साल 29 जुलाई को मनाया जाता है.

मोहन

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