करवा चौथ का त्यौहार कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है. करवा चौथ का व्रत पति पत्नी के आपसी प्रेम और सम्मान का प्रतीक है. इस दिन पत्नी पूरे दिन का उपवास रखती है, तथा रात में चन्द्रमा के उदय होने पर चाँद को अर्घ्य देकर ही जल और भोजन ग्रहण करती है. साथ ही माता गौरी तथा माता करवा से अपने सौभाग्य को बनाये रखने की कामना करती है.
करवा चौथ व्रत विधि
1. करवाचौथ के दिन प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में नहा ले और पूरे दिन निर्जला व्रत का संकल्प ले.
2. दीवार पर गेरू से बेस बनाकर उसके ऊपर पिसे चावलों से करवा माता का चित्र बनाये.
3. पीली मिटटी की गौरी माता बना कर लकड़ी के आसान पे बैठाये तथा गौरी माता की गोद में गणेश जी भगवान को बैठाए.
4. गौरी माता को सुहाग की सभी सामग्री चढ़ाये और माता का श्रृंगार करे.
5. एक जल का भरा लोटा रखे.
6. भेट देने के लिए का मिटटी के करवे को गेहूँ से भरे तथा ढक्क्न में शक़्कर या पूरा रखे तथा दक्षिणा रखे.
7. रोली से करवे पर स्वस्तिक बनाएं.
8. गौरी गणेश और चित्रित करवा की पूजा करे तथा पति की दीर्घायु की कामना करे.
9. करवा पर 13 बिंन्दी रखे तथा 13 गेहूँ या चावल हाथ में लेकर करवा चौथ की कहानी सुने.
10. कहानी सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमा कर बड़ो का आशीर्वाद ले.
11. 13 गेहूँ के दाने और पानी का लोटा अलग रखे.
12. शाम के समय पकवान बनाये तथा वायना पूज कर भेट बड़ो को दे.
13. चाँद निकलने पर छलनी की ओट से चाँद को देखे तथा अर्घ्य दे इसके बाद पति का आशीर्वाद ले और करवा चौथ व्रत का पारण करते हुए भोजन करे.
करवा चौथ व्रत कथा
करवा चौथ की कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है, करवा नाम की एक अति पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ एक गांव में रहती थी. एक दिन जब करवा का पति नदी में स्नान करने गया तो नदी में नहाते समय अचानक एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया. इस पर उसके पति ने करवा को चिल्लाकर सहायता के लिए पुकारते हुए करवा करवा कहा.
करवा एक पतिव्रता स्त्री थी, जैसे ही उसने अपने पति की आवाज़ सुनी तो वह भागकर अपने पति के पास पहुंची और दौड़कर कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांध दिया. मगरमच्छ को सूत के कच्चे धागे से बांधने के बाद करवा यमराज के पास पहुँची.
उस समय यमराज चित्रगुप्त के खाते देख रहे थे. करवा अपने साथ सात सींक भी ले गई तथा वहां जाकर उन्हें झाड़ना शुरू किया, जिससे यमराज के खाते आकाश में उड़ने लगे. यह सब देखकर यमराज करवा से बोले- देवी! तू मुझसे क्या चाहती है? करवा ने कहा- हे प्रभु! एक मगरमच्छ ने नदी में मेरे पति को पकड़ लिया है. आप उस मगरमच्छ को अपनी शक्ति से अपने लोक में ले आओ और मेरे पति की रक्षा करके उन्हें चिरायु करो. इस पर यमराज बोले- देवी! अभी उस मगरमच्छ की आयु शेष है. अत: मैं असमय मगरमच्छ के प्राण नहीं ले सकता. यमराज का कथन सुनकर करवा ने कहा- यदि आपने मेरे पति के प्राणो की रक्षा नहीं की, तो मैं आपको शाप दे दूंगी.
करवा एक पवित्र पतिव्रता स्त्री थी, जिसके पास पातिव्रत बल था, अतः करवा की धमकी सुनकर यमराज डर गए तथा करवा के साथ नदी पर आ गए, जहाँ मगरमच्छ ने उसके पति को पकड़ रखा था. यमराज ने मगरमच्छ के प्राण ले लिए तथा उसे यमलोक पहुँचा दिया. इस तरह यमराज ने करवा के पति के प्राण की रक्षा कर उसे दीर्घायु प्रदान की.
करवा के इस पति प्रेम को देखकर जाते समय यमराज ने करवा को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद भी दिया तथा यह वर भी दिया, कि जो भी सौभाग्यवती स्त्री आज के दिन सच्चे मन से अपने पति की आयु की रक्षा के लिए व्रत करेगी, उनके सौभाग्य की मैं रक्षा करूंगा. इस प्रकार करवा ने पतिव्रत के बल से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी.
जिस दिन करवा ने अपने पति के प्राण बचाए थे, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि थी. इस घटना के बाद यह दिन करवा चौथ के व्रत के नाम से प्रचलित हो गया.
हे करवा माता! जैसे आपने अपने पति के प्राण रक्षा की वैसे ही सबके पतियों के जीवन की रक्षा करना.
करवाचौथ की अन्य कथा
करवाचौथ की कथा के अनुसार, एक गांव में एक साहूकार रहता था. उसके सात लड़के और एक लड़की थी. लड़की सातो भाइयो की बहुत लाड़ली थी, लड़की की शादी के बाद उसका पहला करवा चौथ का व्रत था तो उस लड़की ने भी अपनी माँ और भाभियो के साथ व्रत रखा.
रात को जब उसके भाई खाना खाने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी खाना खाने के लिए कहा, लेकिन बहन ने बताया कि आज उसका व्रत है और वह बिना चंद्रमा को अर्ध्य दिए भोजन नहीं कर सकती है. भाइयो से अपनी बहन को भूख से व्याकुल होते हुए नहीं देखा गया तब सबसे छोटे भाई ने दूर पेड़ पर एक दीपक जलाकर छलनी की ओट में रख देता है. जो ऐसा प्रतीत होता है जैसे चतुर्थी का चांद हो और बहन से कहने लगा बहन अब खाना खा ले चाँद निकल आया है. यह देखकर बहन ने अपनी भाभी से भी कहा कि चंद्रमा निकल आया है व्रत खोल लें, लेकिन भाभियों ने उसकी बात नहीं मानी और व्रत नहीं खोला.
इधन बहन को अपने भाई की यह चतुराई समझ नहीं आई और उस दीपक को चांद समझकर अर्ध्य देकर व्रत खोलने बैठ गई. लेकिन जैसे वह पहला निवाला लिया उसे छींक आ गई, वहीं दूसरे में बाल निकल आया और तीसरा निवाला लेने तक उसके ससुराल से उसके पति की मृत्यु का समाचार आ गया गया है.
यह समाचार सुनकर वह बेतहाशा रोने लगी तब उसकी भाभी ने उसे नकली चांद की सच्चाई की बात बताई और कहा कि उसने गलत तरीके से व्रत तोडा है जिसके कारण देवता नाराज हो गए हैं. इस पर उस लड़की ने निश्चय किया कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करेगी और अपने सतीत्व की शक्ति से करवा माता तथा गोरी माता को प्रसन्न करके अपने पति को पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी.
इस तरह वह अपने पति के शव को लेकर एक वर्ष तक बैठी रही और उसके ऊपर उगने वाली घास को इकट्ठा करती रही. उसने पूरे साल के दौरान पड़ी सभी चतुर्थी का व्रत पूरी श्रद्धा से किया. फिर अगले साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर फिर से पूरे विधि-विधान से करवा चौथ व्रत किया, जिसके
फलस्वरूप करवा माता, माता गौरी और गणेश जी उस पर अति प्रसन्न हुए तथा आशीर्वाद में उसके पति को पुनः जीवित कर दिया.
हे करवा माता जैसे आप उस लड़की पर प्रसन्न हुए, वैसे ही सब पे होना जो करवाचौथ का व्रत पूरे विधि-विधान और श्रद्धा से करे उन सबके पति की रक्षा करना तथा उनका सौभाग्य बनाये रखना.