kalyug ke danveer karna pujneeya sant ramchandra dongre ji maharaj

कलयुग के दानवीर कर्ण पूज्यनीय संत रामचंद्र डोंगरे जी महाराज

रामचंद्र डोंगरे जी महाराज भारत के एक ऐसे पूज्यनीय भागवताचार्य थे. जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे, मात्र एक तुलसीपत्र लेते थे.जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, तो कथा में जो भी दान, दक्षिणा, चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे. रामचंद्र डोंगरे जी महाराज की वाणी में भागवत सुनकर लोग भाव विभोर हो जाते थे. 

डोंगरे जी महाराज ने अपना न तो कोई ट्रस्ट बनाया,और न ही किसी को शिष्य बनाया. उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में लगभग एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो उन्होंने गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान कर दिए थे,  स्वंय कुछ नहीं लिया था. रामचंद्र डोंगरे जी महाराज अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर, प्रसाद ग्रहण करते थे.

रामचंद्र डोंगरे जी महाराज का जन्म इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ था. इनकी माता का नाम कमला ताई और पिता का नाम केशवनभाई डोंगरे था. डोंगरे जी महाराज ने अहमदाबाद में संन्यास लेकर साधना की तथा काशी में अभ्यास करके थोड़े समय तक कर्मकांड का व्यवसाय भी किया. इसके बाद सबसे पहले सरयू मंदिर अहमदाबाद में भगवत कथा कही. 
 
जब डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी, तो अपनी पत्नी को प्रथम रात के समय कहा था, देवी, मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ 108 भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे.

इसके बाद जहाँ जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती. 108 भागवत कथाओ को पूर्ण होने में करीब 7 साल बीत गए. तब डोंगरे जी महाराज अपनी पत्नी से बोले, अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें.

इस पर उनकी पत्नी ने कहा, आपके श्रीमुख से 108 भागवत कथा श्रवण करने के पश्चात मैंने गोपालजी को ही अपना पुत्र मान लिया है, इसलिए अब हमें अपनी संतान की कोई आवश्यकता नहीं है. 

धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका श्री कृष्ण प्रेम.

रामचंद्र डोंगरे जी महाराज की पत्नी जब आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत कथा रस बरसाते थे. इसी दौरान पत्नी की मृत्यु के 5 दिन पश्चात जब उन्हें इसका पता चला. वे अस्थि विसर्जन करने गए, परन्तु अस्थि विसर्जन संस्कार के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे, तो उन्होंने पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल बेचकर अस्थि विसर्जन क्रिया की थी. इसलिये ही उन्हें कलयुग का दानवीर कर्ण कहा जाता है.

गुजराती लोगो का संतराम मंदिर नडियाद गुजरात में अंतिम समय प्रसार कर गुरुवार, दिनांक 9.11.1991 के दिन 9.37 बजे अपने जीवन की अंतिम सांस लेकर रामचंद्र डोंगरे जी महाराज ब्रम्हलीन हुए थे. डोंगरे जी महाराज की इच्छा थी कि उनके नश्वर शरीर को वडोदरा के पास मालसर में नर्मदा मैया के प्रवाह में जल समाधि देकर प्रवाहित किया जाये तो उनका अंतिम संस्कार इसी प्रकार किया गया था.
  
सनातन धर्म ही सर्वोपरि है. ऐसे संत और महात्मा आप को केवल सनातन संस्कृति में ही मिलते है. ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटी कोटी नमन भी कम है.

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