शाकम्भरी माता, माँ आदिशक्ति के नौ अवतारों में से एक है. माता शाकम्भरी की महिमा देवी पुराण व दुर्गा सप्तशती में भी बताई गई है. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मे बेहट से 15 किलोमीटर की दूरी पर विराजमान माँ शाकम्भरी देवी मंदिर, उत्तर भारत का सबसे बड़ा शाकम्भरी सिद्धपीठ है, यह प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों मे से एक है. यहाँ पर माता सती का मस्तक गिरा था.
उत्तर भारत की नौ देवी यात्रा के सबसे अंत मे नौवां दर्शन माँ शाकम्भरी देवी का ही होता है. ऐसी मान्यता है कि इनके दर्शनमात्र से अन्न, फल, धन, धान्य और अक्षय फल की प्राप्ति होती है. सहारनपुर में पड़ने वाली शिवालिक पर्वत शृंखला में माता शाकम्भरी देवी के इस धाम के सबसे प्रथम दर्शन एक चरवाहे ने किये थे. जिसकी समाधि आज भी मंदिर परिसर मे बनी हुई है.
प्रत्येक वर्ष आश्विन नवरात्र मे सहारनपुर के शिवलिक क्षेत्र मे शाकम्भरी देवी का विशाल मेला लगता है. इसके अलावा चैत्र नवरात्र और होली पर भी यहाँ पर माता शाकम्भरी के मेले लगते हैं. माता शाकम्भरी के प्रसाद में हलवा पूरी, सराल-शाक, फल, सब्जी, मिश्री मेवे और शाकाहारी भोजन का भोग लगता है.
माता शाकम्भरी को चौहान सहित अनेक राजपूतो, कश्यपों, ब्राह्मणों, वैश्यों और अनेकों जातियों द्वारा अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है. माता शाकम्भरी के भवन में माता की मुख्य प्रतिमा के दायीं ओर भ्रामरी तथा बायीं ओर शताक्षी देवी की प्राचीन प्रतिमायें विराजमान है पास ही प्रथमपूज्य विघ्नहर्ता गणेश जी भी विराजमान हैं.
माता शाकम्भरी तथा इनके तीनो स्वरूपों से जुडी कथाये
एक समय की बात है हिरण्याक्ष दैत्य के वंश मे एक महादैत्य रूरु था. रूरु का एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दुर्गमासुर था. दुर्गमासुर ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की और चारों वेदों को अपना दास बना लिया.
फिर उसने वेदो का बहुत दुरुपयोग किया, जिसके कारण संसार से पुण्य नष्ट होने लगे, ब्राह्मण भी अधर्म के मार्ग पर चलने लगे, संसार में सूखा पड़ने लगा तथा भूख प्यास से जीव मरने लगे. धार्मिक कार्य न होने की वजह से देवताओ की शक्तियां भी नष्ट होने लगी, यह सब जानकार दुर्गमासुर ने मौका पाकर देवताओ पर आक्रमण दिया तथा देवताओ को हरा दिया.
दुर्गमासुर के डर से देवतागण शिवालिक पर्वत पर जाकर छिप गए तथा माँ जगदम्बा की स्तुति करने लगे, जिसके बाद माँ जगदम्बा ने एक आयोजिना के रूप में पृथ्वी पर अवतरण लिया. जब माँ ने संसार की ऐसी दुर्गति देखी, तो दुःख से उनका हृदय विदित हो आया तथा उनके शरीर में सौ नेत्र प्रकट हुए, माँ की इन आसुओं से आंसू बहने लगे, माता के आँसुओं से सारी पृथ्वी जल से भर गई.
माता के इस सवरूप को सौ नैना यानी सताक्षी नाम से पुकारा गया, इसके बाद माता ने अपने शरीर से अनेको शाखाएं निकाली जिनपर शाक, सब्जी, फल, फूल, सब्जियां लगी. जिससे संसार को भरण पोषण मिला तथा जीवो की क्षुधा शांत हुई. इन्ही माता की कृपा दृष्टि से पहाड़ियों पर कंदमूलो की उत्पत्ति हुई तथा सारी घाटी शाक और कंदमूल से भर गई. देवी जगदम्बा के इसी दिव्य स्वरूप को माता शाकम्भरी नाम दिया गया और इसी नाम से उनकी पूजा होने लगी.
इसके बाद माता शाकम्भरी ने ऋषि मुनियो के यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षषों का संहार करने के लिए माता जगदम्बा ने भीमा देवी का रूप धर लिया. इसके बाद दुर्गमासुर का वध करने के लिए माता ने भ्रामरी देवी का अवतार लिया तथा एक अति सुंदर स्त्री के रूप में पहाड़ी पर जाकर बैठ गई. माता भ्रामरी देवी से आकर्षित होकर जब दुर्गमासुर वहां आया, तो माता ने उसका संहार करके चारो वेदो को दुर्गमासुर से मुक्त करा दिया.
माता शाकम्भरी का मंदिर भारत का एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ पर माता आदिशक्ति के चार स्वरूपो के एक साथ दर्शन होते है. इस मंदिर मे माता शाकम्भरी के साथ भीमा देवी, भ्रामरी देवी और शताक्षी देवी के श्री विग्रह विराजमान है. इन सभी माताओं के प्राकट्य का वर्णन दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य और ग्यारहवें अध्याय मे भी मिलता है.
दुर्गमासुर के साथ युद्ध में माँ जगदम्बा के परम भक्त भूरा देव ने अपने प्राणो का बलिदान दिया था, जिसके फलस्व रूप माता ने भूरा देव को वरदान दिया था, कि उनकी पूजा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सबसे पहले भूरा देव के दर्शन करने होंगे,तब ही मेरी पूजा स्वीकार होगी. जिस स्थान पर माता ने यह वरदान भूरे देव को दिया, वही पर भूरे देव का मंदिर है जो माता शाकम्भरी के मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर है तभी से माता के दर्शन से पहले भूरेदेव के दर्शन करने की प्रथा है.
माता शाकम्भरी के दो अन्य धाम भी बहुत प्रसिद्ध है, जिनमे सकराय तथा साम्भर धाम प्रसिद्ध है. सकराय धाम माता शाकम्भरी देवी के मुख्य तीन मंदिर है. माता शाकम्भरी का दूसरा प्रमुख मंदिर राजस्थान के सकराय गाँव मे अरावली की पर्वतमालाओं की शांत मालकेतु घाटी मे है. सकराय गाँव में माता के दर्शन ब्रह्माणी और रुद्राणी माँ के रूप मे होते है. यहाँ माँ शाकम्भरी अर्थात ब्रह्माणी को सात्विक और रूद्राणी को तामसिक भोजन परोसा जाता था.
माँ का तीसरा प्रमुख मंदिर साम्भर धाम है. माता शाकम्भरी देवी का यह स्थान राजस्थान के जयपुर जिले मे साम्भर कस्बे के पास साम्भर झील मे एक छोटी सी पहाड़ी पर है. चिलचिलाती धूप और रेगिस्तान की तपती रेत के बीच साम्भर धाम मंदिर एक आध्यात्मिक स्थान है. माता का यह मंदिर महान राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान के समय बनाया गया था उससे पहले यहाँ पर जंगल होता था, जिसे घाटी देवी की बनी कहा जाता था.