जगतगुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज तुलसी पीठाधीश्वर और संस्थापक रहे है और सनातन धर्म के रक्षकों में उनकी गिनती होती है.
जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज चित्रकूट में रहते है और उनका पूर्वाश्रम नाम गिरिधर मिश्र है. रामभद्राचार्य जी एक प्रख्यात विद्वान्, संस्कृत के प्रकांड पंडित, शिक्षाविद्, बहुभाषाविद्, रचनाकार, प्रवचनकार, दार्शनिक, आध्यात्मिक नेता, कवि, गीतकार, गायक, साहित्यकार और कथाकार आदि विभूतियों से अलंकृत दिव्य पुरुष है. वह रामानन्द सम्प्रदाय के चार जगद्गुरु रामानन्दाचार्यों में एक रह चुके हैं.
स्वामी रामभद्राचार्य जी का जन्म मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर में सचीपुरम ग्राम में हुआ था. जब रामभद्राचार्य जी महज दो महीने थे तभी उनके नेत्रों की दृष्टि चली गयी थी. स्वामी रामभद्राचार्य जी का बाल्यकाल में नाम गिरिधर था और आज पूरी दुनिया में जगदगुरु श्री रामभद्राचार्य जी के नाम से जाने जाते हैं.
स्वामी जी बाल्यकाल में ही अपनी दिव्यता के दर्शन करा दिए थे जब उन्होंने महज 3 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिख दी थी. 5 साल की उम्र में फिर यह बालक पूरी श्रीमदभगवत गीता के 700 श्लोकों को अध्याय और श्लोक नंबर सहित याद करके अगले पायदान पर चढ़ गया. जब स्वामी रामभद्राचार्य जी 7 साल के हुए तो की उन्होंने महज 60 दिनों में श्रीरामचरितमानस की 10 हजार 900 चौपाइयां और छंद कंठस्त कर लिए.
दृष्ष्टिहीन होने के बावजूद स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज 22 भाषाओं में बात करने की विद्वत्ता रखते है. साथ ही 100 से अधिक पुस्तकें और 50 से भी ज्यादा रिसर्च पेपर बोलकर लिखवा चुके हैं.
स्वामी रामभद्राचार्य जी की विद्वत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण प्रभु श्री रामजन्मभूमि केस के दौरान मिला. श्री रामजन्मभूमि केस की सुनवाई के समय जब मुस्लिम पक्ष की ओर प्रश्न किया गया कि अगर बाबर ने राममंदिर तोड़कर मस्जिद बनायीं तो तुलसी दास ने इस बात का जिक्र रामचरित्रमानस में क्यों नहीं किया.
यह सवाल उस समय इतना भारी लगा था कि हिंदू पक्ष के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया. लेकिन तब संकट मोचन बने श्रीरामभद्राचार्य ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में गवाही देते हुए बताया कि तुलसीदास ने दोहाशतक में एक दोहा लिया है और जब जज साहब को उन्होंने कंठस्त वह दोहा सुनाया तो स्पष्ट हो गया क्योंकि उसमें बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा राम मंदिर तोड़े जाने का साफ जिक्र है. वह दोहा कुछ इस प्रकार है....
रामजन्म मंदिर महिं मंदिरहि तोरि मसीत बनाय ।
जबहि बहु हिंदुन हते, तुलसी कीन्ही हाय ।।
दल्यो मीर बाकी अवध, मंदिर राम समाज ।
तुलसी रोवत हृदय अति, त्राहि त्राहि रघुराज ।।
यह सुनते ही कोर्ट में चारो ओर जय जय कार हो गई और इस घटना के बाद जहाँ एक ओर स्वामी रामभद्राचार्य जी की विद्वत्ता को प्रमाण तो मिला ही उनकी ख्याति भी चहुँ और फ़ैल गयी.
24 जून 1988 को काशी विद्वत परिषद द्वारा स्वामी गिरिधर को जगदगुरु रामभद्राचार्य की उपाधि दी गयी थी. इसके बाद 3 फरवरी 1989 में प्रयागराज के कुंभ मेले में सभी संत समाज द्वारा स्वामी गिरिधर को श्री रामभद्राचार्य की उपाधि भी दी गई.
श्री रामभद्राचार्य तुलसी पीठ के संस्थापक और जगदगुरु रामभद्राचार्य हैंडिकैप्ड यूनिवर्सिटी के आजीवन कुलपति भी हैं. विश्व हिंदू परिषद के मार्गदर्शक के रूप में भी वह हिंदुओं को प्रेरणा देते रहे हैं.
एक बार जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज जी ने चैनल पर न्यूज एंकर से भी कहा था - मैं जन्म से दृष्टिहीन होते हुए भी, सभी वेदों को कंठाग्र कर चुका हूँ, डेढ़ लाख से अधिक पन्ने मुझे कंठस्थ हैं. अब इससे बड़ा और कौन सा चमत्कार देखना चाहती हो बेटी...
प्रणाम है ऐसे महान संत को...
22 जनवरी 2024 को राम मदिर अयोध्या में श्रीराम मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद कुछ दिन बाद ही अचानक जब स्वामी रामभद्राचार्य जी के स्वास्थ्य में कमी आयी तो सारा देश उनके लिए और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की. और स्वामी जी जल्द ही स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जीने लगे.