गुरु पूर्णिमा पर्व हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाया जाता है. इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था. महर्षि वेदव्यास को ही आदिगुरु भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता और 18 पुराणों की रचना की थी. भारतीय संस्कृति में ज्ञान पुंज को अवलोकित करने वाले महर्षि वेदव्यास के जन्मोत्सव आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है.
गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु की शुरुआत में आती है. इसी दिन से चातुर्मास भी आरम्भ होता है जिसमें चार महीनों तक साधु-सन्त एक ही जगह पर रहकर ज्ञान, अर्जन और वर्णन करते हैं. इन चार महीनो में मौसम भी अच्छा बना रहता है. न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक सर्दी होती है. इसलिए अध्ययन के लिए भी यह समय सबसे अधिक उपयुक्त माना गया हैं.
जैसे सूर्य के ताप से जलती हुई धरती को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु के चरणों में बैठे साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की सामर्थ्य मिलती है. गुरु पूर्णिमा पर, चंद्रमा और ग्रहों के बीच एक निश्चित गठबंधन होता है, जो साधकों के लिए ज्ञान प्राप्त करने का भी बहुत उपयुक्त समय होता है.
शास्त्रों में गुरु शब्द की व्याख्या इस प्रकार की हैं कि गुरु शब्द में गु का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान और रू का अर्थ उसके निरोधक के रूप में प्रकाश या ज्ञान से लिया गया है, यानी गुरु का अर्थ अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला अर्थात शिष्य के मन में अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का मार्ग दिखाने वाला गुरु होता है.
गुरु पूर्णिमा का त्यौहार केवल भारत में ही नहीं बल्कि नेपाल और भूटान में भी बड़े धूम धाम और श्रद्धा भाव से मनाया जाता है.
बौद्ध धर्म को मानने वाले भी गुरु पूर्णिमा पर्व को भगवान बुद्ध की याद में मनाते हैं. इनकी मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध ने इसी दिन उत्तर प्रदेश के सारनाथ में अपना पहला ज्ञान उपदेश दिया था. ऐसा भी माना जाता है कि इसके बाद ही बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई थी.
भारत में देश में गुरुओं की महत्ता और सम्मान पुरातन काल से चला आ रहा हैं, मनुष्य जीवन में गुरु का स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना गया है.
यानी गुरु ही शिष्य के मन मे विद्या के प्रकाश का उजाला कर अंधकार और कष्टों को दूर करते हैं और आत्मा का परमात्मा से मिलन कराते हैं, गुरु ही ईश्वर से साक्षात्कार कराते हैं. गुरु ही वह मार्ग प्रशस्त करते हैं जिससे ईश्वर से मिलन संभव हो पाता है. गुरु द्वारा शिष्य को प्रदान की जाने वाली दिशा और राह की महत्ता के कारण गुरु का स्थान ईश्वर के समान बताया गया हैं, और कहा जाता है कि -
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अर्थात, गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है.