किसान और प्रकृति के मित्र केचुए को भारतीय कृषि परम्परा का एक अभिन्न अंग माना जाता है. केचुए मिटटी की सबसे ऊपरी परत में पाए जाने वाले भुकृमि है और विशेष रूप से जैविक खेती में केंचुओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है. मिटटी को उपजाऊ बनाये रखने की अद्भुत क्षमता की वजह से केचुओं की सहायता से एक अच्छी और पौष्टिक फसल प्राप्त की जा सकती है साथ ही केचुए पर्यावरण की रक्षा भी कर करते हैं.
केंचुए को किसानों का मित्र कहा जाता है, और न केवल जीवित बल्कि मृत अवस्था में भी केंचुआ किसान के बहुत काम आता है. केंचुआ पालन की विधि को वर्मी कल्चर तथा इनकी सहायता से बनी खाद को वर्मी कंपोस्ट कहा जाता हैं.
वैज्ञानिक नामावली में केंचुए संघ ऐनेलिडा के सदस्य हैं. भारत में केंचुओं की दो सामान्य प्रजाति पाई जाती है, जिसमे एक प्रजाति का वैज्ञानिक नाम फेरेटिमा पोस्टहुमा और दूसरी प्रजाति का वैज्ञानिक नाम लुम्ब्रिकस टेरेस्ट्रिस है.
केंचुआ एक द्विलिंगी प्राणी है अर्थात नर तथा मादा जननांग एक ही शरीर में पाए जाते हैं. केंचुए के शरीर में 100 से 120 तक खंड होते हैं. इसके शरीर में कोई आंख नहीं होती है, लेकिन इसके पास पाए जाने वाले प्रकाश रिसेप्टर्स होते हैं, जिसकी सहायता से यह अंधेरे और प्रकाश को का पता कर लेता है. केंचुए के कान भी नहीं होते हैं, लेकिन यह अपने शरीर के पास दूसरे जानवरो की कंपन महसूस करने की अद्भुत क्षमता रखता है.
केचुए की उपयोगिता के बारे में सबसे पहले चार्ल्स डार्विन नामक एक महान वैज्ञानिक ने सन 1881 में बताया था.
अपने कार्यो के आधार केंचुओं को मुख्यतः तीन भागों में बांटा गया है, जो निम्न प्रकार है.
1. एपिजिक केंचुए : जो केंचुए कूड़े और पत्तियों की परत में रहते हैं तथा मिट्टी में पोषक तत्वों को मिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उन्हें एपिजिक केचुए कहते है.
2. एंडोजिक केंचुए : इस प्रकार के केंचुए मिट्टी में थोड़ा गहराई में रहते हैं, और मिट्टी की वातन और जल निकासी में सुधार करने में मदद करते हैं.
3. एनेसिक केंचुए : ये केंचुए मिट्टी की ऊपरी परत और कूड़े के बीच रहते हैं, साथ ही ये उपरोक्त दोनों एपिजिक और एंडोजिक केंचुओं की विशेषताओं को साझा करते हैं.
कैसे पहुँचाते हैं केंचुए मिट्टी को लाभ :
1. केंचुए मिटटी में मृत कार्बनिक पदार्थों जैसे पत्तियों, खरपतवारों और जानवरों के गोबर को खाकर उसे पचाते हैं. उसे पोषक तत्वों युक्त मिटटी में बदल देते है जिससे केचुओं के मल के रूप में मिट्टी में पोषक तत्व मिल जाते हैं, जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम, जो पौधों के लिए बहुत आवश्यक होते हैं.
2. केंचुए मिट्टी में सुरंगें बनाते हैं, जिससे हवा और पानी का मिट्टी में प्रवेश और निकास आसान हो जाता है. जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और मिटटी की जल-धारण क्षमता बढ़ जाती है.
3. केचुओं की वजह से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या भी बढ़ती है जो मिट्टी की उर्वरता और पौधों के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
4. केंचुए मिट्टी के कणों को एक साथ बांधकर मिट्टी के क्षरण को रोकने में भी मदद करते हैं.
5. केंचुओं का उपयोग करके जैविक खेती की जाती है, जो कि एक स्थायी और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धति है. इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से बचा जाता है, और केंचुओं को मिट्टी की उर्वरता और फसलों की वृद्धि के लिए प्राकृतिक रूप से उपयोग किया जाता है.
6. केंचुओं का उपयोग करके जैविक खेती के प्रमुख लाभ बेहतर स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन पाना होता है. जैविक रूप से उगाई गई फसलें रासायनिक अवशेषों से मुक्त होती हैं और स्वास्थ्य के लिए अधिक फायदेमंद होती हैं.
7. पर्यावरण संरक्षण में भी केंचुआ आधारित जैविक खेती महत्वपूर्ण योगदान देती है. क्योंकि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कम होने से मिट्टी और पानी प्रदूषण से बचता है.
8. क्योंकि मिट्टी की उर्वरता में केंचुओं के उपयोग से वृद्धि होती है, इसलिए यह जिससे फसलों की पैदावार में बढ़ोतरी में भी सहायक होते है.
9. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर किसान का होने वाला बहुत अधिक खर्च, केंचुआ आधारित खेती से बहुत हद तक कम किया जा सकता है.
10. मछलीयां पकड़ने में भी केंचुओं का प्रयोग किया जाता है.
मिट्टी में केंचुए का संचलन, मिट्टी को मिलाता है और वायु-प्रसार में मदद करता है. यह मिट्टी के खनिजरण और पौधों के बढ़ने में भी मदद करता है. केंचुए की कुछ प्रजातियां जो मिट्टी की सतह पर चरती हैं; उनका संचलन कार्बनिक पदार्थ को मिट्टी के साथ मिलाता है जो पौधों के लिए पोषक तत्वों के रूप में बहुत अच्छा कार्य करता है. इन सभी कृषि के फायदों की वजह से, केंचुओं को किसान का मित्र कहा जाता है.
जैविक खेती के लिए केचुआ खाद बनाने का काम, आज एक उत्तम व्यवसाय का रूप में विकसित हो चुका है. डेयरी फार्म से भरपूर मात्रा में गोबर सुलभता से मिल जाती है. क्योंकि जैविक खाद के लिए गोबर ही कच्चा माल होता है. गोबर लेने के उपरांत उससे बहुत कम लागत में केंचुआ खाद तैयार किया जाता है.
जिसके बाद इस केंचुआ खाद की अच्छे तरीके से साफ सफाई करके पॉलिथीन बैग में हाथ की पैकिंग कर मार्केट में सप्लाई की जा सकती है. केंचुआ खाद बनाने के लिए गोबर खरीदने के बाद अन्य केंचुआ खाद बनाने वाले व्यक्तियों से केंचुएं खरीदे जाते है. जिसमें एक बेड के लिए कम से कम 10 किलो केचुआ खरीद कर बेड तैयार की करते है. इसमें 40 से 45 दिनों में खाद तैयार हो जाता है और साथ ही साथ केंचुए की जनसंख्या में भी वृद्धि होती रहती है, इस प्रकार केंचुआ जनसंख्या वृद्धि का लाभ लेते हुए, धीरे धीरे बेडों की संख्या बढ़ाई जा सकती है. अतः केंचुआ आधारित जैविक खाद का बिजनेस एक आसानी से किया जाने वाला व्यवसाय है.
साथ ही यदि किसान अपने खेतों में रासायनिक उर्वरक डालना बंद कर दे और गाय का गोबर व जैविक उर्वरक डालना शुरू कर दे, तो खेतों में केंचूए अपने आप भी उत्पन हो सकते है.
केंचुए की मादा प्रजनन प्रणाली में अंडाशय, डिंबवाहिनी और शुक्राणु होते हैं. जिसमें अंडाशय का एक जोड़ा, 13वें खंड में मौजूद होता है. प्रत्येक अंडाशय में अनेक अंगुलियों के समान प्रक्षेप होते है, इन प्रक्षेपों में विकासशील अण्डाणु एक पंक्ति में उपस्थित होते हैं.
केंचुआ वृद्धि के लिए वातावरण अनुकूलन स्थिति 15-25 ˚C तापमान और 75-90 % नमी मानी जाती है. जिसमें वे अम्लीय और क्षारीय स्थितियों को भी सहन कर सकते हैं, लेकिन लगभग 7 का पीएच आदर्श माना जाता है. अत्यधिक अम्लता को चूने (कैल्शियम कार्बोनेट) की मदद से ठीक किया जा सकता है. केंचुए अपेक्षाकृत कम ऑक्सीजन और उच्च कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर पर भी जीवित रह सकते हैं, लेकिन इष्टतम विकास के लिए वातन बहुत महत्वपूर्ण है.
केंचुआ बेड्स की उचित जल निकासी यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि बेड्स गीले न हो, क्योंकि इससे ऑक्सीजन की कमी हो सकती है और अवायवीय जीवाणुओं की वृद्धि हो सकती है, जो कि विषाक्त पदार्थ, कीड़े के लिए काफी हानिकारक हो सकती हैं.
अतः केंचुएं न केवल किसान बल्कि पर्यावरण, जन सामान्य के स्वास्थ्य, प्रकृति और जलवायु के लिए भी सहायक अवयव है.