durga puja festival and its significance

दुर्गा पूजा उत्सव एवं इसका महत्त्व

दुर्गा पूजा हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है, जो बुराई पे अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार अश्विन महीने में मनाया जाने वाला यह त्यौहार 10 दिन तक मनाया जाने वाला भव्य उत्सव है.

दुर्गा पूजा का उत्सव बंगाल, असम तथा कई उत्तरी पश्चिमी राज्यों में प्रमुखता से मनाया जाता है. इसमें विभिन्न प्रकार के पंडालों को सजाया जाता है, जहाँ माता की मूर्ति की स्थापना की जाती है तथा पूरे विधि विधान से माँ का आवाहन किया जाता है.

दुर्गा पूजा से जुडी पौराणिक कथाये 

दुर्गा पूजा से जुडी एक सबसे अधिक प्रचलित कथा है कि प्राचीन समय में महिसासुर नाम का एक राक्षक हुआ, जिसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की तथा उनसे वरदान माँगा कि किसी मनुष्य या देवता द्वारा उसका वध न हो सके. जिसके बाद सभी मनुष्य और देवता उससे डरने लगे तथा उस राक्षक का आतंक बढ़ने लगा.

इसके पश्चात त्रिदेव ब्रह्मा जी, विष्णु भगवान तथा शिव शंकर ने अपनी शक्तियो को मिलाकर एक नई शक्ति का निर्माण किया जो माँ दुर्गा के रूप में उत्पन्न हुई, इसी महाशक्ति माँ दुर्गा ने फिर महिषासुर का वध किया.
 
इसी विषय में एक दूसरी कथा है कि जब रावण से युद्ध के समय भगवान् श्री राम जी का पक्ष कमजोर पड़ने लगा तो, प्रभु श्री राम जी ने भी 9 दिनों तक माँ दुर्गा की कठोर साधना की थी, जिससे प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें युद्ध में दिव्य सहायता प्रदान की थी. इसके बाद ही राम जी ने रावण पर विजय प्राप्त की, जिसके प्रतीक स्वरुप विजय दशमी पर्व मनाया जाता है.       

इस उत्सव से जुडी और भी कई कथाये प्रचलित है, लेकिन एक मान्यता यह भी है कि माँ दुर्गा जो माता पार्वती का ही रूप है, एक बार 9 दिनों के लिए अपने मायके रहने आती है. इसलिए जैसे ससुराल से मायके आने वाली बेटी को खुश रखा जाता है, वैसे ही माँ को भी हर प्रकार से इन नौ दिनों में खुश रखने की कोशिश की जाती है.

माँ दुर्गा की मूर्ति की साज सज्जा की जाती है, माँ के साथ उनके बच्चे भगवन गणेश तथा कार्तिकेय भी आते है तथा उनकी भी पूजा अर्चना की जाती है. किसी भूल की वजह से माँ दुर्गा क्रोधित होकर माँ काली का रूप ना ले इसके लिए भगवान शिव की मूर्ति भी को भी दुर्गा पूजा में विशेष स्थान दिया जाता है. इसके आलावा माता लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती की पूजा भी की जाती है.

माँ दुर्गा की मूर्ति 10 भुजाओं वाली शेर पर सवार महिषासुर का सिर काटने के प्रतीक स्वरुप में होती है. जो यह दर्शाती है कि बुराई चाहे कितनी भी चतुर और शक्तिशाली क्यों न हो उसका अंत निश्चित होता ही है. नौ दिनों तक माता की पूजा की जाती है तथा दसवे दिन देवी की मूर्ति को विषर्जित किया जाता है. अर्थात ख़ुशी ख़ुशी माता को अपने ससुराल यानि भगवान शिव के पास हिमालय के लिए विदा किया जाता है. 

दुर्गा पूजा उत्सव अनुष्ठान
 
दुर्गा पूजा में कई तरह के परंपरागत अनुष्ठान किये जाते है जिसमे पंडाल में पूजा के लिए आई मूर्ति पर आँखों की औपचारिक पेंटिग की जाती है जिसे चोखोदान कहते है. इसके बाद माता को जाग्रत करने के अनुष्ठान किये जाते है जो नवमी तक हर रोज होते है. प्रत्येक अनुष्ठान के लिए मंत्र उच्चारण तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है. सातवे दिन यानि सप्तमी कनव पत्रिका स्नान होता है, जो केले के पौधे के रूप में उपस्थित गणेश जी की पत्नी को समर्पित होता है.  अष्टमी के दिन अंजलि दी जाती है, जिसका शाम को आरती से समापन होता है. नवमी के दिन धुनुची नमक नृत्य किया जाता है, जो माता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है. 

इसके बाद विजय दशमी के दिन सिंदूर खेला होता है, जिसमे सभी विवाहित महिलाये माता को तथा एक दूसरे को सिंदूर लगती है. इसके साथ ही वो माँ दुर्गा से सदा सौभाग्यवती होने की कामना भी करती है. उत्सव के समापन में माता दुर्गा की प्रतिमा को नदी में विसर्जित किया जाता है. 

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