divya deshmukh a talented chess player of india

दिव्या देशमुख भारत की प्रतिभाशाली शतरंज खिलाड़ी

दिव्या देशमुख भारत की प्रतिभाशाली शतरंज खिलाड़ी है. बहुत कम उम्र से ही दिव्या देशमुख ने न केवल राष्ट्रीय बल्किअंतरराष्ट्रीय मंच पर चेस की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी है. सितम्बर 2024 में विश्व अंडर-20 शतरंज चैंपियनशिप जीतकर आईएम दिव्या देशमुख विश्व जूनियर गर्ल्स चेस चैंपियन बनी थी. 

महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली दिव्या देशमुख शतरंज की दुनिया में एक उभरती हुई स्टार मानी जाती हैं. उन्होंने शतरंज की कई बड़ी प्रतियोगिताओं में जीत दर्ज करते हुए, शतरंज सर्किट में खुद को स्थापित किया है. दिव्या देशमुख ने केवल शतरंज बल्कि सामाजिक तौर पर भी लोगों के लिए बड़ी प्रेरणास्रोत बन गई हैं.

दिव्या देशमुख का जन्म 9 दिसंबर, 2005 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था. मेडिकल लाइन की पारिवारिक पृष्ठ्भूमि से आने वाली दिव्या के पिता जितेंद्र देशमुख और माता नम्रता देशमुख दोनो ही पेशेवर डॉक्टर है. दिव्या देशमुख की प्रारंभिक शिक्षा भवन्स भगवानदास पुरोहित विद्या मंदिर से हुई है.

जब दिव्या महज 5 साल की थी, तो उनके पिता जितेंद्र देशमुख ने शतरंज के खेल से रूबरू करवाया था. शतरंज से अवगत होने पर बाल्यावस्था से ही दिव्या देशमुख की शतरंज के प्रति रूचि ने इसमें उनके प्रभावशाली करियर के मार्ग की मजबूत नीव रख दी थी. हालांकि दिव्या का चेस की दुनिया में आना एक अजीब घटना से भी जुड़ा है जोकि इस प्रकार हैं.

दरसअल दिव्या की बड़ी बहन बैडमिंटन खेलती थीं, तो उनके माता-पिता उसके साथ जाते थे. उस समय दिव्या चार-पाँच साल की थी, तो वह भी उनके साथ जाने लगी. जब दिव्या ने बैडमिंटन खेलने का प्रयास किया, तो वह नेट तक भी नहीं पहुँच पाती थी. इसलिए उसी हॉल में शतरंज भी खेला जाता था, तो दिव्या उसे देखने लगती.

शतरंज देखने से धीरे धीरे दिव्या की उसमें रूचि जगी और फिर उसी में मन रम गया. फिर दिव्या की बहन ने तो कुछ समय बाद बैडमिंटन खेलना छोड़ दिया, लेकिन दिव्या अपनी लगन से बड़े मुक़ाम पर पहुँच गयी.

फिर दिव्या की शतरंज में दिलचस्पी को देखकर उनके पिता डॉक्टर जितेंद्र और माता नम्रता ने नागपुर में अपने घर के नज़दीक स्थित शतरंज अकादमी में उनका नाम रजिस्टर्ड करा दिया था. जहां पर मिली कोचिंग से दिव्या ने दो साल में ही अपनी प्रतिभा के रंग दिखाना शुरू कर दिये थे. 

जैसे जैसे समय के साथ दिव्या का इंटरेस्ट शतरंज में बढ़ा उनकी पहचान एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी के तौर पर होने लगी. सन 2012 में पुडुचेरी में राष्ट्रीय शतरंज में अंडर-7 का ख़िताब जीतते हुए मात्र 7 साल की उम्र में अपना पहला राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर शतरंज की प्रोफेशनल दुनिया में अपना पहला कदम रखने वाली दिव्या देशमुख ने फिर जल्द ही एशियाई स्कूल शतरंज चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल करते हुए, अपने लिए उपलब्धियों की एक ऐसी श्रृंखला शुरु कर दी, जो आगे चलकर तेजी से बढ़ती चली गई. 

फिर 2013 में दिव्या मात्र सात साल की उम्र में महिला फ़िडे मास्टर बनीं तो तब वह सबसे कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करने वाली खिलाड़ी बनीं थी. 

सन 2020 में मशहूर FIDE ऑनलाइन शतरंज ओलंपियाड 2020 की विजेता टीम का दिव्या देशमुख भी हिस्सा थी. 2020 में ही जब दिव्या देशमुख भारतीय ओलंपियाड टीम की नियमित सदस्य बनी और उनकी गिनती देश की दिग्गज खिलाड़ियों में होने लगी. तो उन्हें नियमित तौर पर महान भारतीय चेस चैंपियन विश्वनाथन आनंद से टिप्स मिलने लगीं. इससे दिव्या के खेल में बड़े सुधार आये.

इसी दौरान विश्वनाथन आनंद ने दिव्या देशमुख के बारे में कहा था कि, यह बहुत बड़ी उपलब्धि है. जिन्होंने झू जिनर, तान झोंगजी और हरिका जैसी दिग्गज खिलाड़ियों को हराया है. उसके अंदर ज़बरदस्त प्रतिभा है, इसलिए यह कोई अप्रत्याशित बात नहीं है. लोगों को उनसे यह उम्मीद थी और उन्होंने यह करके दिखाया है.

सन 2021 में दिव्या देशमुख को भारत की महिला ग्रैंडमास्टर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. दिव्या देशमुख भारत की 21वीं महिला ग्रैंडमास्टर बनी थी. 

सन 2022 में भारतीय महिला शतरंज चैंपियनशिप में खिताब जीतकर दिव्या देशमुख ने शतरंज सर्किट में अपने करियर का धमाकेदार आगाज किया था. 

फिर 2023 में एशिया में खिताब जीतकर दिव्या ने अपनी प्रतिभा को दोबारा साबित किया था. साथ ही अपनी प्रतिभा को भारत से बाहर एशियाई स्तर पर भी साबित किया था. 2023 में ही वह टाटा स्टील इंडिया शतरंज टूर्नामेंट (महिला रैपिड) की भी चैंपियन बनी थी. 

मई 2024 में शारजाह चैलेंजर्स इवेंट की भी दिव्या देशमुख विजेता बनी थी.

19 सितम्बर 2024 को गुजरात के गांधीनगर में आयोजित विश्व अंडर-20 जूनियर शतरंज चैंपियनशिप के फाइनल मुकाबले में अंतर्राष्ट्रीय मास्टर दिव्या देशमुख ने बुल्गारियाई ग्रैंड मास्टर बेलोस्लावा क्रस्टेवा को बुरी तरह हारते हुए 11 में से 10 अंक हासिल किए थे. इस जीत के साथ ही दिव्या देशमुख ने काफी सुर्खियां बटोरी थी. जिसके बाद उन्होंने कहा था, कि यहां मैंने गेम प्रेशर को हैंडल करना सीखा है और साथ ही यह भी सीखा कि सामान्य तौर पर बेहतर कैसे खेला जाए.

दिव्या देशमुख की कहानी न केवल शतरंज की बिसात पर महारत हासिल करने वाली है, बल्कि जीवन की चुनौतियों पर काबू पाने और रूढ़ियों को तोड़ने वाली एक वीरांगना की भी है.

अपनी प्रोफेशनल उपलब्धियों के साथ ही कार्यक्षेत्रों में फैली राजनीती और लिंगभेद जैसी कुरीतियों पर भी दिव्या देशमुख ने न केवल जीत दर्ज की बल्कि अन्य लोगो के लिए भी हिम्मत और निडरता की मिसाल कायम की.

एक बेहतरीन शतरंज खिलाडी होने के बावजूद जब दिव्या को टाटा स्टील मास्टर्स प्रतियोगिता 2023 में लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, जहाँ पर दर्शकों ने उनके खेल के बजाय उनके रूप-रंग जैसे अप्रासंगिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया. 

तो दिव्या देशमुख ने इस गलत व्यवहार का मुखरता से विरोध करते हुए इस मुद्दे को बड़े स्तर पर उठाने और  संबोधित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया, जिसमें शतरंज समुदाय में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए गंभीरता से अपना पक्ष रखा.

लैंगिक असमानता के दिव्या देशमुख द्वारा किये गए इस खुलासे ने शतरंज समुदाय में एक गहन चर्चा को जन्म दिया, जहाँ कुछ सभ्य लोगों ने एकजुटता दिखाते हुए उनका समर्थन किया, तो कुछ ने उनके रुख की आलोचना करते हुए यह दिखा दिया की दिव्या का यह मुखर विरोध बहुत हिम्मत का निर्णय है. 

दिव्या देशमुख का लैंगिक भेदभाव के प्रति विरोध जाहिर करने के निर्णय ने, महिला खिलाड़ियों के लिए समान सम्मान और मान्यता की आवश्यकता के लिए समाज में जागरूकता बढ़ाने का कार्य किया.

दिव्या की इस बात का शतरंज की दिग्गज खिलाड़ी सुसान पोल्गर ने जोरदार समर्थन किया, और उनकी भावनाओं को दोहराते हुए शतरंज में लैंगिक भेदभाव के अपने अनुभव भी साझा किए. पोल्गर ने खुलासा किया कि उन्होंने कई बार जानबूझकर खुद को साधारण रूप में पेश किया ताकि उन्हें लैंगिक भेदभाव का शिकार न होना पड़े. उन्होंने भी शतरंज के इस खेल में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को बड़े स्तर पर उजागर किये. 

दिव्या देशमुख की शतरंज की दुनिया में यात्रा महत्वाकांक्षी शतरंज खिलाड़ियों को प्रेरित तो करती ही है, साथ ही उन बाधाओं और रूढ़ियों को भी तोड़ती है जो गलत है. और कहती है कि लिंग के बजाय प्रतिभा और कौशल पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.

सन 2024 में जब भारत ने शतरंज ओलंपियाड 2024 में दुर्लभ दोहरा स्वर्ण महिला और पुरुष दोनों प्रतियोगिताओं को जीतकर इतिहास रचा तो 45वें शतरंज ओलंपियाड में भारत की इस बड़ी उपलब्धि में दिव्या देशमुख भी हिस्सेदार थी. क्योंकि वह महिला शतरंज टीम में शामिल थी.

28 जुलाई 2025 को 19 वर्ष की उम्र में दिव्या देशमुख ने FIDE वूमेन्स वर्ल्ड कप 2025 का खिताब जीतकर बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की थी. इस टूर्नामेंट में उन्होंने दुनिया की शीर्ष महिला शतरंज खिलाड़ियों में शुमार भारत की ही कोनेरू हम्पी को हराया था. दिव्या देशमुख ने FIDE वूमेन्स वर्ल्ड कप 2025 जीतकर केवल खिताब नहीं जीता था बल्कि एक नया इतिहास भी रचा था. 

दिव्या देशमुख शतरंज विश्व कप जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी थी. इसके साथ ही दिव्या देशमुख भारत की 88वीं ग्रैंडमास्टर भी बनी थी. ग्रैंडमास्टर की उपाधि शतरंज की दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित उपलब्धि मानी जाती है और इसे हासिल करना किसी भी खिलाड़ी के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक होता है. 

इस जीत के बाद दिव्या को इनामी राशि के रूप में लगभग 43 लाख रुपये मिले. दिव्या देशमुख का ग्रेंडमास्टर बनने का यह सफर काफी मुश्किलों से भरा था, क्योंकि इस टूर्नामेंट में उन्होंने कई बड़े उलटफेर किए. जैसे कि उन्होंने दूसरी वरीयता प्राप्त जिनेर झू (चीन) को हराया. फिर भारत की डी. हरिका को हराकर पूर्व विश्व चैम्पियन टैन झोंगयी को सेमीफाइनल में हराया था. 

FIDE वूमेन्स वर्ल्ड कप 2025 का यह फाइनल सिर्फ दिव्या देशमुख की व्यक्तिगत उपलब्धि का गवाह नहीं बना, बल्कि इसने यह भी साबित किया, कि भारतीय महिला शतरंज नयी बुलंदियों पर है. दिव्या देशमुख ना सिर्फ वर्ल्ड चैम्पियन बनीं, बल्कि साथ ही वह भारत की चौथी महिला ग्रैंडमास्टर भी बनी. 

चेस ग्रैंडमास्टर (GM) बनने के लिए आमतौर पर तीन ग्रैंडमास्टर नॉर्म्स होते है, जिन्हे पूरा करना होता है.  लेकिन कुछ खास इंटरनेशनल टूर्नामेंट जीतने पर भी खिलाड़ी को सीधे ग्रैंडमास्टर का टाइटल दिया जाता है, और FIDE वूमेन्स वर्ल्ड कप उन्हीं में से एक है. दिव्या देशमुख को भी इसी प्रकार ग्रेंडमास्टर का टाइटल मिला है, क्योंकि वह भी बाकी नॉर्म्स पूरे नहीं कर रही थी.   

दिव्या से पहले भारत की जिन तीन महिला चेस खिलाड़ियों को ग्रैंडमास्टर का दर्जा मिला, उनमें कोनेरू हम्पी, हरिका द्रोणावल्ली और आर. वैशाली शामिल हैं.

ग्रैंडमास्टर बनने के बाद दिव्या देशमुख ने खुद कहा था कि मुझे इस जीत को समझने के लिए समय चाहिए. मुझे लगता है कि यह केवल नियति की बात थी कि मुझे इस तरह ग्रैंडमास्टर का खिताब मिला. क्योंकि इस टूर्नामेंट पहले मेरे पास एक भी ग्रैंडमास्टर नॉर्म नहीं था और अब मैं ग्रैंडमास्टर हूं. 

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