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धनतेरस पर्व का महत्त्व तथा इससे जुडी पौराणिक कथाएं

धनतेरस पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है, इसी दिन से दीपावली उत्सव की भी शुरुआत हो जाती है. धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, कुबेर जी की पूजा की जाती है. भगवान धन्वंतरि स्वास्थ्य और आयुर्वेद के देवता हैं तथा इसी दिन वह हाथ में अमृत कलश लेकर समुद्र -मंथन से प्रकट हुए थे. धनतेरस का दिन माता लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक भी है, कुबेर धन के देवता है, इसलिए उनकी पूजा भी धनतेरस के दिन की जाती है. साथ ही धनतेरस के दिन यम दीप का दान भी किया जाता है.  

धनतेरस के दिन लोग चांदी के बर्तन खरीदते है, ताकि उसके रूप में माता लक्ष्मी का आगमन घर में हो तथा चांदी शीतलता का प्रतीक भी होती है.

धनतेरस से जुडी पौराणिक कथाएं 

समुंद्र मंथन की धन्वंतरि जी की कथा -

धनतेरस पर्व को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. इस सन्दर्भ में एक पौराणिक घटना है कि एक बार देवराज इंद्र ने अपने अहंकार वश दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया था, जिससे क्रोधित होकर महर्षि दुर्वासा ने इंद्र को तीनों लोकों से श्रीहीन होने का श्राप दे दिया. इस श्राप के फलस्वरूप अष्टलक्ष्मी जी विलुप्त हो गई और अपने लोक को चलीं गयीं. 

इस प्रकार तीनो लोको के श्रीहीन होने के कारण सभी देवता और दैत्य परेशान हो गए तथा  पुनः तीनो लोकों में श्री जी की स्थापना करने के उद्देश्य से त्रिदेवों के पास पहुंचे. अपनी इस समस्या का समाधान करने की विनती करते हुए महादेव से सहायता मांगी. तब महादेव ने सभी देवों और दैत्यों को मिलकर समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया, जिसे सभी देवताओं और दैत्यों ने स्वीकार कर लिया.

अब समुद्र को मथने लिये मंदराचल पर्वत को मथानी की तरह उपयोग किया गया तथा वासुकी नाग को मथनी  बनाया गया, इसके साथ ही समुद्र मंथन को आरम्भ हुआ. समुद्र मंथन से चौदह प्रकार के प्रमुख रत्नों प्राप्त हुए जिनमे चंद्र, अपराजिता पुष्प, ऐरावत हाथी, कामधेनु गाय, वारुणी, कल्पवृक्ष, अप्सरा, उच्चैःश्रवास घोडा, माता लक्ष्मी, पांचजन्य शंख, हालाहल विष, कौस्तुभा रत्न, और चौदहवें रत्न के रूप में स्वयं भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत का कलश लिए हुए प्रकट हुए.

भगवान श्री हरी विष्णु ने धन्वंतरि जी को सभी देवताओं का वैद्य और समस्त वनस्पतियों तथा औषधियों का स्वामी नियुक्त किया. धन्वंतरि जी के वरदान से ही सभी वृक्षों और वनस्पतियों में रोगनाशक शक्ति उत्पन्न हुई है.

भगवान धन्वंतरि ने जनकल्याण के लिए अमृतमय औषधियों की खोज की थी तथा इन्हीं के वंश में शल्य चिकित्सा के जनक और महर्षि विश्वामित्र के पुत्र ऋषि सुश्रुत उत्पन्न हुए, जिन्होंने आयुर्वेद के महानतम ग्रन्थ सुश्रुत संहिता की रचना की थी. 

माता लक्ष्मी के आगमन से जुडी धनतेरस की कथा -

धनतेरस की माता लक्ष्मी की कथा के अनुसार एक समय की बात है, भगवान श्री हरी विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आये तो माता लक्ष्मी जी ने भी उनको साथ लेकर चलने का आग्रह किया. इस पर विष्णु जी ने शर्त रखी कि यदि आप मृत्युलोक पर मेरे साथ चलोगे तो मैं जो बात कहूंगा, वैसे ही माननी पड़ेगी, तो लक्ष्मी जी ने विष्णु जी की शर्त को स्वीकार कर लिया. इस प्रकार  भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी जी भूमण्डल पर आ गए.

कुछ देर विचरण करने के  बाद एक स्थान पर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी से कहा - मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ, आप इसी स्थान पर रुकना मेरे पीछे मत आना. यह कहकर विष्णु जी दक्षिण दिशा की ओर चले गए. विष्णु जी के जाने पर माता लक्ष्मी जी के मन में यह जानने की उत्सुकता हुई, कि दक्षिण दिशा में ऐसा क्या है जो विष्णु जी उन्हें साथ लेकर नहीं गए. 

लक्ष्मी जी का दूसरा नाम चंचला भी है, सो माता लक्ष्मी से रहा नही गया और विष्णु जी की आज्ञा व शर्त का उल्लंघन करके लक्ष्मी जी भी विष्णु जी के पीछे-पीछे चल पड़ीं. कुछ दूर चलने पर लक्ष्मी जी को एक सरसों का खेत दिखाई दिया, जो ख़ूब फला फूला था. सरसों की शोभा से लक्ष्मी जी मुग्ध हो गईं और उसके फूल तोड़कर अपना शृंगार किया. थोड़ी दूर आगे चलने पे माता लक्ष्मी को गन्ने (ईख) का खेत दिखाई दिया. लक्ष्मी जी ने चार गन्ने लिए और उनका रस चूसने लगीं. 

उसी क्षण श्री हरि विष्णु जी वहा आ गए और लक्ष्मी जी को वहां देखकर बहुत नाराज़ हुए. लक्ष्मी जी से बोले - देवी मैंने आपको मेरे पीछे आने से  मना किया था, परन्तु आप नहीं मानीं और यहां आकर किसान के खेत से गन्ने चोरी करने का अपराध कर बैठी. अब आपको इस अपराध की सजा भोगनी होगी तथा इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करनी होगी. ऐसा कहकर भगवान श्री हरि लक्ष्मी जी को भूमण्डल पर छोड़कर वापस क्षीरसागर चले गए. 

लक्ष्मी जी अब किसान के घर रहने लगीं, वह किसान बहुत गरीब  था. लक्ष्मी जी को उस पर दया आई तथा वह  किसान की पत्नी से बोली - तुम प्रातः स्नान करके पहले देवी लक्ष्मी का पूजन किया करो, उसके बाद ही रसोई बनाया करो तथा घर के बाकि कार्य किया करो, ऐसा करने पर तुम जो मांगोगी वही मिलेगा. किसान की पत्नी ने लक्ष्मी जी के बताये अनुसार ही सब कुछ किया तो कुछ ही दिन में पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया.

इस प्रकार किसान के 12 वर्ष बड़े आनन्द मंगल से कट गए तथा 12 वर्ष के बाद जब श्री हरि विष्णु जी, लक्ष्मी जी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया. लक्ष्मी जी ने भी किसान की मर्जी के बिना, वहाँ से जाने से मना कर दिया. तब विष्णु जी ने किसान को चार कोडियां देकर कहा, तुम परिवार सहित गंगा में जाकर स्नान करके आओ और इन कौड़ियों को भी वही गंगा जल में छोड़ देना, जब तक तुम वापिस घर नहीं लौटोगे, तब तक मै लक्ष्मी जी को यहा से नहीं ले जाऊंगा. 

किसान ने विष्णु जी की बात मान ली तथा वह सपरिवार गंगा स्नान करने के लिए निकल गया, गंगा स्नान बाद जैसे ही उसने गंगा में कौड़ियां डालीं, वैसे ही चार हाथ गंगा में से निकले और वे कौड़ियां ले ली, यह देखकर किसान को आश्चर्य हुआ. तब किसान ने गंगा जी से पूछा- माता! ये चार भुजाएं किसकी हैं? 

गंगा जी बोलीं- हे किसान! वे चारों हाथ मेरे ही है. तूने जो कौड़ियां मुझे भेंट दी हैं, वे तुम्हे कहा से प्राप्त हुई? किसान ने कहा- मेरे घर में 12 वर्ष से एक स्त्री रहती है, उन्होंने ही मुझे ये कौड़िया दी है, परन्तु अब उन्हें उनके पति लेने आये है. इस पर गंगा जी बोलीं- तुम्हारे घर जो स्त्री रहती है, वह साक्षात लक्ष्मी जी हैं और जो उनके पति है, वह श्री हरि विष्णु भगवान हैं. तुम लक्ष्मी जी को जाने मत देना, नहीं तो फिर से निर्धन हो जाआगे. 

यह सुन किसान घर लौट आया और लक्ष्मी जी का आंचल पकड़ लिया और बोला- मैं आपको नहीं जाने दूंगा. तब विष्णु भगवान ने किसान से कहा- इन्हें तो सब अपने पास रोकना चाहते है, परन्तु ये तो चंचला हैं, कहीं ठहरती ही नहीं, मेरी दी हुई सजा के कारण ही ये 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं, परन्तु अब इनकी सजा का समय पूरा हो चुका है, अतः मैं इन्हे लेने आया हूँ. 

किसान हठ पर बैठ गया और बोला - नहीं  मैं लक्ष्मी जी को नहीं जाने दूंगा. तब लक्ष्मी जी ने कहा- हे किसान! अगर तुम मुझे रोकना चाहते हो, तो जैसा मै कहूं वैसा करो, कल कार्तिक माह की त्रयोदसी है. कल तुम घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना, सांयकाल में मेरा पूजन करना. रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और एक तांबे  के कलश में रुपया भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी. 

उस समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी लेकिन वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी, अगर मुझे अपने घर में  रखना चाहते हो तो है, तो इसी तरह प्रतिवर्ष मेरी पूजा करना. यह कहकर माता लक्ष्मी दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं. 

अगले दिन किसान ने लक्ष्मी जी के कथानुसार पूजन किया तो उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया. इसी भांति वह हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरस के दिन लक्ष्मी जी की पूजा करने लगा और माता लक्ष्मी जी की कृपा - प्रसाद प्राप्त करने लगा. 

इसी प्रकार जो व्यक्ति धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी जी का आवाहन करता है, माता लक्ष्मी पूरे साल उसके घर में विराजमान रहती है. 

यम दीप दान से जुडी धन तेरस कथा -  
 
यम दीप दान की धन तेरस कथा के अनुसार, धनतेरस की शाम को घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है,  इस प्रथा से जुडी एक कथा है जिसके अनुसार, एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा - क्या कभी प्राणियों के प्राण हरते समय तुम्हें कभी किसी पर दया आई  है? 

यमदूत संकोच में पड़कर बोले- नहीं महाराज! हमे आप जो आज्ञा देते हो हम उसका पालन करते हैं. यमराज को लगा, कि शायद ये संकोचवश ऐसा कह रहे हैं. अतः यमराज ने उन्हें बिना संकोच किये बोलने को कहा - तब यमदूतों ने डरते-डरते बताया कि एक बार ऐसी ही घटना घटी थी, जब उनका हृदय काँप उठा था.

ऐसी क्या घटना घटी थी? यह सुनकर उत्सुकतावश, यमराज ने पूछा ऐसा क्या हुआ था. तब यमदूतों ने कहा- महाराज! हंस नाम का राजा एक दिन शिकार खेलते हुए, जंगल में अपने साथियों से बिछड़कर भटक गया और दूसरे राज्य की सीमा में चला गया.

वहाँ के राजा हेमा ने राजा हंस का बड़ा सत्कार किया. उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक अति सुन्दर पुत्र को जन्म दिया था. लेकिन कुंडली के अनुसार, उस बालक के विवाह के चार दिन बाद उसकी मृत्यु का योग था. अतः राजा हेमा ने उस बालक को ब्रह्मचारी रखने का निर्णय किया तथा उसे यमुना के तट पर एक गुफा में भेज दिया गया. उसको  स्त्रियों की छाया से भी दूर रखा गया, किन्तु विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता था.

कुछ समय बाद जब बालक युवा हुआ तो संयोग से एक दिन राजा हंस की युवा पुत्री यमुना नदी के तट पर आई और राजा हेमा के पुत्र को देखकर उस पर महित हो गई. उसने उस ब्रह्मचारी राजकुमार से गंधर्व विवाह कर लिया, विवाह के बाद चौथा दिन आया और राजकुमार की मृत्यु हो गई.

उस नवविवाहित कन्या का करुण-विलाप सुनकर हमारा हृदय भी काँप गया था. ऐसी सुंदर जोड़ी हमने कभी नहीं देखी थी. वे दोनों कामदेव तथा रति से भी कम नहीं थे. उस युवक को कालग्रस्त करते समय हमारे भी अश्रु निकल आये थे.  

यमराज ने द्रवित होकर कहा- क्या किया जा सकता है? विधि के विधान की मर्यादा के लिए हमें भी ऐसा अप्रिय कार्य करना पड़ता है. तब एक दूत ने यमराज से पूछा- क्या अकालमृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है? 

यमराज बोले अगर कोई धनतेरस के पूजन एवं दीपदान को विधिपूर्वक करता है, तो उसके परिवार को अकाल मृत्यु से छुटकारा जाता है, जिस घर में यह पूजन होता है वहां अकाल मृत्य नहीं होती है. इसी मान्यता के अनुसार, धनतेरस की शाम लोग मुख्य द्वार पर तथा आँगन में यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं. 

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