देव दिवाली का त्यौहार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन सभी देव पृथ्वी लोक पर आते है तथा दीवाली मनाते है.
देव दिवाली भगवान शिव को समर्पित पर्व है. यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश के काशी तथा वाराणसी में मनाया जाने वाला त्यौहार है. देव दिवाली को दीपावली पर्व के पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है. इस दिन गंगा माता के घाट पर लाखो करोड़ों दिए जलाये जाते है तथा माँ गंगा को श्रद्धा सुमन अर्पित किये जाते है.
देव दिवाली पर्व की शुरुआत सबसे पहले पंचगंगा घाट पर हजारो दिए जलाकर की गई थी.
देव दीवाली पर्व से जुडी कथा -
काशी में देव दिवाली मनाये जाने से जुडी एक कथा काफी प्रचलित है, जिसके अनुसार जब भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया, तो उन्होंने माता के लिए काशी नगरी बसाई, परन्तु कुछ समय बाद भगवान शिव ने काशी से प्रस्थान करने का निर्णय लिया, लेकिन फिर शिव को लगा कि उनकी अनुपस्तिथि में कशी नगरी अस्त व्यस्त हो जाएगी. अतः वह ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे काशी के एक ऐसे व्यक्ति के विषय में पूछा जो उसकी राजा के रूप में रहकर सेवा व्यवस्था देख सके.
तब ब्रह्मा जी ने धन्वंतरि के पुत्र रिपुंजय के पास जाकर उन्हें काशी का राजा बनने के प्रस्ताव दिया. रिपुंजय ने ब्रह्मा जी का यह प्रस्ताव स्वीकार तो कर लिया, परन्तु एक शर्त भी रख दी, कि काशी में किसी भी देव गण का आना वर्जित होगा. ताकि वह बिना किसी हस्तक्षेप के काशी का संचालन सुचारु रूप से कर सके.
ब्रह्मा जी ने रिपुंजय की बात मान ली, लेकिन ब्रम्हा जी ने भी रिपुंजय से शर्त रखी कि काशी धरती का सबसे उत्कृस्ट स्थान होना चाहिए जहाँ हर एक व्यक्ति का सम्मान हो. रिपुंजय ने ब्रम्हा जी की बात मान ली और काशी का स्वामित्व स्वीकार किया.
इसके बाद ब्रह्मा जी ने ही रिपुंजय का नाम भी बदलकर दिवोदास रखा. फिर कुछ समय बाद जब भगवान शिव का मन अपने नगर में जाने का हुआ तो, उन्हें याद आया कि ब्रह्मा जी के वचन अनुसार, वह काशी नहीं जा सकते. लेकिन शिव जी ने विभिन्न प्रकार के जतन करके राजा दिवोदास को देवो के काशी में आगमन के लिए मना लिया, ताकि देवगण भी काशी आ सके.
तब देवगण काशी आये, घाट पर स्नान किया तथा काशी घाट पर ख़ुशी से दीपोत्सव मनाया, तभी से यह देव दीवाली को यह दीपोत्सव मनाया जाता है.
देव दिवाली के दिन लोग सुबह गंगा स्नान करके अपने मृतक परिजनों के लिए दीप दान भी करते है ताकि जब देवगण स्वर्ग जाये तो उन लोगो को भी अपने साथ ले जाये जो मृत्यु के बाद पृथ्वी पर भटक रहे है और उनका भी उद्धार हो जाये.
देव दिवाली पूर्णिमा के रूप मे मनाया जाता है, जो यह धरती से अहंकार, क्रोध, लोभ, वासना, के आधार सहज ज्ञान को त्यागकर देवताओं, भगवान की वापसी का जश्न होता है.
पहले लोग काशी में देव दिवाली का भव्य उत्सव नहीं करते थे, तब लोग कार्तिक पूर्णिमा को धार्मिक महात्म्य के कारण घाटों पर स्नान-ध्यान करने आते थे. साथ ही अपने घरों से लाये दीपक गंगा तट पर जलाते थे और कुछ माँ गंगा की पावन जल धारा में प्रवाहित करते थे.
काशी के गंगा घाट तटों पर पहले ऊचे बांस-बल्लियों में टोकरी टांग कर उसमें आकाशदीप जलाते थे, जो देर रात्रि तक जलते रहते थे. इसके माध्यम से लोग धरती पर देवताओं के आगमन का स्वागत एवं अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते थे..