छठ पूजा पर्व कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. छठ पूजा प्रमुख रूप से भारत के बिहार राज्य में मनाया जाता है, हालांकि भारत के अन्य कई राज्यों के साथ साथ विदेशो में भी काफी लोग छठ पूजा मनाते है. यह पूजा हर साल दिवाली के छठे दिन मनाई जाती है.
प्रकृति के प्रत्येक कण में भगवान को देखना ही भारतीय संस्कृति है, जिसका एक उदाहरण छठ पूजा का यह महा पर्व भी है, जिसमे सिर्फ उगते सूरज को ही नहीं बल्कि डूबते सूरज को भी अर्ध्य दिया जाता है. बिहार में आस्था के इस महापर्व छठ पूजा को लेकर लोगों के अंदर कितना विश्वास और श्रद्धा है, इसका सबसे बेहतरीन नजारा मुंगेर के घाटों पर देखने को मिलता है.
इस पर्व में सूर्य देव और छठी माता की पूजा की जाती है. सूर्य को जीवनदाता और छठी माता को संतान की देवी माना जाता है. हिन्दू धर्म में बच्चा होने के छठे दिन जिस माता की पूजा करके छठी मनाई जाती है, ये वही छठी माता होती है, ये छठी माई शिव और शक्ति के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय की पत्नी भी है. छठी माई को पूर्वी भारत के राज्यों में देवसेना नाम से भी पुकारा जाता है.
छठ पूजा के दिन लोग सूर्य देव और छठी माता का आभार, धन्यवाद करते हैं, और परिवार की समृद्धि तथा बच्चों की लंबी उम्र के लिए विनय प्रार्थना करते हैं. छठ पूजा प्रकृति के प्रति मनुष्य की कृतज्ञता का भी प्रतीक है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, वेद और शास्त्रों के लिखे जाने से भी पहले से इस पूजा को मनाया जा रहा है, क्योंकि ऋग्वेद में भी छठ पूजा जैसे ही कुछ रिवाजों के बारे में बताया गया है, जिसमे सूर्य देव की पूजा की बात कही गयी है. उस समय ऋषि-मुनियों द्वारा इसी प्रकार के व्रत रखकर सूर्यदेव की उपासना की जाती थी.
हालांकि, कुछ कथाओं के अनुसार, भगवान श्री राम और माता सीता ने उस उपवास की शुरुआत की थी. वनवास से लौटने के बाद भगवान राम और माता सीता दोनों ने ही उपवास रखकर सूर्य देव की उपासना की थी. यह उपवास कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में किया जाता था. उसी समय से छठ पूजा एक अहम हिंदू त्योहार बन गया और हर साल उन्ही मान्यताओं के साथ मनाया जाने लगा.
माता सीता ने सबसे पहला छठ पूजन मुंगेर के गंगा तट पर किया था, जिसके बाद बिहार में छठ महापर्व की शुरुआत हुई थी. छठ व्रती भारी संख्या में घाट पर गंगा स्नान करने और गंगा जल लेने जाते हैं. छठ महापर्व की शुरुआत गंगा स्नान और नहाय खाय के साथ शुरू होती है, दूसरे दिन खरना होता है, इस दिन चावल और गुड़ की खीर का प्रसाद बनता है.
छठ पूजा की विधि सालों से वैसी ही चली आ रही है. यह चार दिन का पर्व होता है, जिसमे महिलाओ द्वारा 36 घंटों का उपवास भी रखा जाता है.
पहला दिन नहाय-खाय होता है, जिसमे श्रद्धालु पावन नदी में डुबकी लगाते हैं, और नदी का पानी अपने घर ले जाते हैं इसी पानी से छठ का प्रसाद बनाया जाता है.
लोहंडा छठ पूजा का दूसरा दिन होता है, इसमें श्रद्धालु पूरे दिन का उपवास रखते हैं. यह उपवास सूर्यास्त के बाद ही खत्म होता है, इस दिन खीर, केले और चावल से प्रसाद बनाया जाता है. कुछ श्रद्धालु उपवास रखने के बाद 36 घंटों तक बिना खाये या पानी पिए भी रहते है.
तीसरे दिन को संध्या अर्घा कहते है इस दिन फिर से प्रसाद बनाया जाता है, और शाम को उसे चढ़ाने के बाद एक बार फिर नदी में डुबकी लगाई जाती है, और सूर्य भगवान तथा छठी मइया की उपासना की जाती है.
चौथे दिन को ऊषा अर्घा होता है इसमें सूर्योदय के वक्त पूजा होती है, इसमें सुबह नदी में डुबकी लगाई जाती है और व्रती श्रद्धालु जल में खड़े होकर सूर्योदय का इंतजार करते है, और इसी समय उपवास पारण करके खोला जाता है.
छठ पूजा का महत्व :
छठ पूजा आध्यात्मिक विकास में भी मदद करती है. छठ पूजा में उपवास, ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से लोग अपने भीतर शांति और संतुष्टि प्राप्त करते हैं, यह पूजा लोगों को एक साथ लाती है, और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है. इस छठ पूजा को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा माना जाता है.