bhakta salbeg aur jagannath rath yatra

भक्त सालबेग और जगन्नाथ रथ यात्रा

सालबेग का नाम भक्ति कवियों की श्रेणी में प्रमुख स्थान रखता है. ये श्री जगन्नाथ जी के परम भगत थे, इनके पिता मुस्लिम थे और मुग़ल सेना में सैनिक थे. जिन्होंने जबरदस्ती एक हिन्दू ब्राह्मण विधवा से शादी की थी, जिनका एक पुत्र था सालबेग. सालबेग बचपन से ही मुस्लिम धर्म को मानते थे और बड़े होकर मुग़ल सेना में सैनिक हुए. 
    
मुस्लिम धर्म मानने के बाद भी सालबेग अपनी माता के हिन्दू धर्म से बहुत प्रभावित थे. एक बार उनके सर पर ऐसी चोट लग गई जो किसी भी वैद्य, हकीम से ठीक नहीं हो पा रही थी. जिसकी वजह से सालबेग को मुगलसेना से भी निकल दिया गया. तब माँ के कहने पर सालबेग ने भगवान विष्णु की भक्ति की और भक्ति में खो गए.  

एक दिन भगवान जगन्नाथ जी ने सालबेग को सपने में दर्शन दिए और उनके घाव पर भभूत लगाई जिससे उनका घाव कुछ ही दिन में बिलकुल ठीक हो गया.  भगवान का ऐसा चमत्कार देख कर सालबेग का भगवान के प्रति विश्वास दृढ हो गया. अब सालबेग दिन रात भगवान के गुणगान करने लगे. भगवान श्री जगन्नाथ जी के दर्शन की इच्छा से वह पुरी धाम पहुंचे, परन्तु जन्म से मुस्लिम होने के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिला. जिससे सालबेग को बड़ा दुःख हुआ और इसके बाद वे वृन्दावन चले गए. जहाँ सालबेग ने कृष्ण भक्ति की और अनेको भजन भगवान श्री कृष्ण की स्तुति में गाये. वृंदावन में वह एक साल तक रहे. 
 
वृंदावन में एक साल रहने के बाद सालबेग जगन्नाथ रथ यात्रा देखने की इच्छा से पुरी धाम की तरफ चल पड़े, क्योंकि गैर हिन्दू सिर्फ रथ यात्रा में ही भगवान के दर्शन कर सकते थे. लेकिन रास्ते में कुछ कठिनाई आने के कारण सालबेग को लगा कि वह समय से पहुंच नहीं पाएंगे तो उन्होंने मन ही मन भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करी कि हे प्रभु आपके दर्शन के लिए मैंने एक वर्ष प्रतीक्षा की है, कृपया अब थोड़ी सी प्रतीक्षा आप भी करना. 

कहा जाता है कि भगवान ने अपने भक्त के लिए तीन दिन प्रतीक्षा की और अपना रथ रोक लिया. रथ को चलाने के लिए बहुत उपाय किये गए, पूजा की गई, परन्तु रथ एक इंच भी नहीं खिसका. सब पुजारी, पंडित हैरान थे फिर जब सालबेग वहा पहुंचा तो उसके आते ही रथ चल पड़ा. भगवान जगन्नाथ की ऐसी महिमा देख कर सब लोग हैरान रह गए. तबसे सालबेग उसी स्थान पर रहने लगे जहाँ भगवान ने उसके लिए प्रतीक्षा की थी. श्री जगन्नाथ की स्तुति में उन्होंने अनेको भजन लिखे. उनके मरने के बाद उसी स्थान पर सालबेग की मजार बना दी गई. 

सालबेग की भक्ति को सम्मान देने के लिए आज भी हर साल उनकी मजार पर दो क्षण के लिए भगवान श्री जगन्नाथ जी का रथ रोक दिया जाता है. भगवान अपने भक्तों में कभी अंतर नहीं करते, जो भी उन्हें सच्चे मन से याद करता है भगवान उसकी इच्छा पूरी जरुर करते है.    

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