बैंगन को उसके नाम के अतार्किक संधि विच्छेद बे-गुण यानि बिना किसी गुण वाली सब्जी बताने वाले नहीं जानते है, कि बैगन में बहुतेरे गुण होते है.
बैंगन भारत में उगाई जाने वाली एक प्राचीन देशज सब्जी है. ऊँचे भागों को छोड़कर भारत के लगभग सभी भागों में बैंगन की सब्जी उगाई जाती है. बैंगन सब्जियों का राजा है, और प्रकृति ने भी बैंगन के सिर पर ताज बनाया है.
बैगन में एंथोसायनिन नामक एक जैविक पदार्थ होने के कारण इसकी ऊपरी परत का रंग बैंगनी होता है. अलग अलग आकार और अलग अलग रंग में पाए जाने वाला बैंगन हमारी सेहत से जुड़ी अनेक समस्याओं के लिए किसी रामबाण से कम नहीं है.
बैंगन का वैज्ञानिक नाम सोलेनम मेलोंगना है. अंग्रेजी भाषा में बैगन को ब्रिंजल कहते है. मुर्गी के अंडे जैसे दिखने वाले छोटे आकार के सफेद बैगन को अमेरिका में एग्गप्लान्ट भी कहा जाता है. बैगन कई रंगों जैसे हरा, बैगनी, सफ़ेद, नीले आदि रंगो में पाया जाता है.
बैगन के प्रकार -
बैंगन कई प्रकार के रंगों ही नहीं बल्कि विभिन्न आकारों के भी होते है, छोटे से लेकर बड़े तक दिखने वाले बैंगन, गोल और लंबे भी होते हैं. गोल, गहरा बैंगनी, लंबा बैंगनी, लंबा हरा, गोल हरा, हरापन लिए हुए सफेद, सफेद, छोटा गोल बैंगनी रंगवाला, वामन बैंगन, ब्लैकब्यूटी, गोल गहरे रंग वाला, मुक्तकेशी, रामनगर बैंगन, गुच्छे वाले बैंगन आदि.
बैंगन सोलेनेसी कुल के सोलेनम मेलोंगना के अंतर्गत आता है. बैंगन के फल को पकने में काफी अधिक समय लगता है. अत: इसके बीज की प्राप्ति के लिए किसी एक फल को चुनकर, उसमें कुछ चिह्न लगाकर, पकने के लिए छोड़ देना चाहिए.
बैगन के न्यूट्रिशनल गुण -
मात्रा प्रति 100 gram,
कैलोरी - 24 (kcal),
कुल वसा - 0.2 gm,
संतृप्त वसा - 0 gm,
बहुअसंतृप्त वसा - 0.1gm ,
मोनोअसंतृप्त वसा - 0 gm,
कोलेस्टेरॉल - 0 mg ,
सोडियम - 2 mg,
पोटैशियम - 229 mg,
कुल कार्बोहायड्रेट - 6 gm,
आहारीय रेशा - 3 gm,
शर्करा - 3.5 gm,
प्रोटीन - 1 gm,
विटामिन ए - 23 IU,
विटामिन सी - 2.2 mg,
कैल्सियम - 9 mg,
आयरन - 0.2 mg,
विटामिन डी - 0 IU,
विटामिन बी6 - 0.1 mg,
विटामिन बी12 - 0 µg.
बैगन के औषिधिय गुण -
100 gm बैगन से लगभग 25 Kcal पाया जाता है. जो लोग वजन कम करना चाहते है उनके लिए इस सब्ज़ी का सेवन करना सर्वोत्तम होता है. साथ ही यदि सलाद और हरी भाजियों का भी सेवन किया जाए तो आहिस्ता आहिस्ता वजन में काफी घटोतरी हो सकती है.
बैगन में 92% पानी पाया जाता है, अतः यह डिहाइड्रेशन से बह बचाता है.
बैगन के सेवन से पेट को साफ़ रखने में भी मदत मिलती है.
मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति भी बैगन का सेवन कर सकते हैं.
इसके सेवन से शरीर के अंदर खराब कोलेस्ट्रॉल को कम किया जा सकता है.
बैगन के सेवन से जोड़ो में होने वाले दर्द को भी कम किया जा सकता है.
कैंसर से सम्बंधित आधुनिक शोध परिणामों पर गौर किया जाए तो जानकारी मिलती है, कि इसके सही इस्तेमाल से कैंसर जैसे भयावह रोगों से भी काफी हद तक लड़ा जा सकता है. बैंगन में पाए जाने वाले फाइबर्स से कोलोन कैंसर के मरीज की स्थिति में काफी कारगर सुधार हो सकते है. कोलोन के पास स्त्रावित होने वाले घातक टॉक्सिन्स और रसायनों को अवशोषित करने में बैंगन के अंदर पाए जाने वाले, ये फाइबर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सामान्यत: कोलोन के पास इन्ही टॉक्सिन्स और घातक रसायनों के जमावड़े की वजह से ही कैंसर के हालात बनते हैं. वे लोग जो भविष्य में हो सकने वाली इस समस्या की संभावनाओं से छुटकारा पाना चाहते हैं, उन्हें निश्चित तौर पर बैंगन को अपने रोजमर्रा के खान-पान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना लेना चाहिए.
व्यक्ति को सप्ताह में तीन बार अधकच्चे बैंगन का सेवन जरूर करना चाहिए. यह शरीर में चर्बी को जमा नहीं होने देता है.
बैंगन में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स, फ्री रेडिकल कोशिकाओं पर आक्रमण कर ब्रेन ट्यूमर की संभावनाओं का भी खातमा करते हैं.
बैंगन की फसल और देखभाल -
बैंगन महीन, समृद्ध, भली भाँति जलोत्सारित, बलुई दुमट मिट्टी में अच्छा उपजता है. बैंगन के पौधों को खेत में बैठाने के पूर्व मिट्टी में सड़ी हुई गोबर की खाद को प्रयुक्त किया जा सकता हैं. प्रति एकड़ चार गाड़ी राख भी डाली जा सकती है. बैंगन तुषारग्राही होता है. साधारण तौर पर बैंगन की बोआई तीन भागों में हो सकती है.
(1) जून जुलाई में बैंगन का बीज खेतों में डाला जा सकता है, और पौधे ऊँचे हो जाएँ, तब इनकी पौध को खेत में रोपा जा सकता है. 115 से 120 दिनों में इन पौधों पर फल लगने लगता है. कुछ समय बीतने पर जब फल का लगना कुछ कम हो जाये तो कभी-कभी छँटाई करने से, नए प्ररोह निकलने लगते है और उन पर फिर फल लगने लगता है.
(2) फरवरी में बीज बोने से वर्षा ऋतु में पौधे फल देने लगते है.
(3) नवंबर की रोपाई से फल फरवरी में लगने लगते हैं, हालांकि जाड़े के दिनों में पौधों की वृद्धि कुछ कम होती है.
अतः पहली बोआई सबसे अच्छी है और उससे अधिकतम फल प्राप्त होता है, प्रति एकड़ औसत उपज 100-150 मन तक भी हो सकती है.
बैगन की फसल में होने वाले रोग तथा उनका समाधान -
बैंगन की फसल में लगने वाला प्रमुख कीट, ल्युसिनोड आर्वोनेलिस एक पतिंगा होता है, जिसकी कैटरपिलर छोटे तनों और फलों में छेद करके अंदर चली जाती है. इससे बैंगन के पेड़ मुरझाकर सूख जाते हैं. इसी वजह से इसके फल खाने योग्य नहीं रह जाते है और कभी कभी सड़ भी जाता है. इसकी रोकथाम के लिए रोगग्रस्त तनों को तुरंत काटकर हटाकर, उसे जला देना चाहिए.
यूज़ोफेरा पार्टिसेला नामक पतिंगे की कैटरपिलर बैंगन के पौधे के तने में छेद करके प्रवेश कर जाती और उसका गुदा खाती है, जिससे पौधों का बढ़ना रुक जाता है और आक्रांत भाग सूख जाता है. इसके निवारण के लिए रोगग्रस्त तनों को तुरंत काटकर हटा देना और उसे जला देना चाहिए.
अगर आप बैंगन के पौधे को कीड़ों से बचाना चाहते हैं, तो यह हैक आपके बहुत काम आ सकता है. इसके लिए, आप 250 ग्राम नीम की पत्तियों को 3 लीटर पानी में अच्छी तरह से पका लें. फिर एक स्प्रे बोतल में भरें और पत्तों पर छिड़कें. इसका नियमित रूप से इस्तेमाल करने पर पौधे को कीटों से छुटकारा मिल जाएगा.
बैगन से बनने वाले विभिन्न पकवान -
बैगन से अनेकों पकवान बनाये जा सकते है जो बेहद ही स्वादिष्ट होते है, जैसे आलू बैगन, बैंगन का भुर्ता, भरवां बैगन, कश्मीरी खट्टे बैंगन, खसखस बैंगन, बैगन के पकोड़े आदि.