अहोई अष्टमी व्रत की हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है. यह व्रत माताओं के द्वारा अपनी संतान की सुख समृद्धि और स्वास्थ के लिए रखा जाता है. अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के तीन दिन बाद होता है. अहोई अष्टमी के दिन सुबह से ही निर्जला व्रत रखा जाता है तथा दिन के समय में माता अहोई, भगवान शंकर और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है, यह व्रत रात को तारों को अर्घ्य देकर पूर्ण किया जाता है.
अहोई माता भी माता पार्वती का ही एक रूप है, जो संतान प्रदान करने तथा उसकी रक्षा करने वाली देवी है. ऐसा माना जाता है कि अहोई माता की कृपा से बंध्या योग, गर्भपात से मुक्ति, संतान की असमय मृत्यु होना एवं दुष्ट संतान योग आदि सभी कुयोग खत्म हो जाते हैं.
भारत में पहले ज्यादातर स्थानों पर केवल पुत्रवती महिलाएं ही ये व्रत रखती थीं, लेकिन अब यह व्रत संतान की इच्छा रखने वाली और कन्याओं की माताएं भी रखती हैं,
अहोई अष्टमी व्रत विधि
1. अहोई अष्टमी के दिन महिलाये प्रातःकाल स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लेती हैं.
2. नित्य कर्मों से निपट कर माताएं, नए वस्त्र पहनती हैं और पूजा की तैयारी करती है.
3. सबसे पहले गेरू से अहोई माता का चित्र दीवार पर बनाया जाता है कुछ लोग इसके स्थान पर चित्रित कलैंडर को भी लगाते है.
4. अहोई चित्र के सामने मिटटी का एक घड़ा तथा उसके ऊपर लौटा पानी से भरकर रखे जाते इसे दोघड़ भी कहा जाता है.
5. दोघड़ को चाँदी का एक अहोई यंत्र पहनाया जाता है, जिसकी पूजा होती है. अहोई यंत्र पर स्याऊ माता तथा उसके बच्चो बने होते है. इस यंत्र का पूजा में बहुत महत्त्व होता है. पूजा के बाद व्रती महिलाएं इस यंत्र को अपने गले में पहनती है. इसके बाद अहोई अष्टमी की कथा सुनी जाती है.
6. शाम को पूजा के समय पकवान इत्यादि का भोग, अहोई माता को लगाया जाता है. इसके अलावा उन्हें वस्त्र, जल और अनाज भी अर्पित किया जाता है. अहोई माता से संतान के सौभाग्य की प्रार्थना भी करते है.
7. इसके बाद घर के बड़ों को कुछ वस्त्र, भोजन और मुद्रा भेंट की जाती है, जिसके बाद घर के बड़े बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं.
8. अब व्रती महिलाएं, तारे दिखने का इंतजार करती हैं, और उसके बाद उन्हें जल अर्पित करके व्रत का पारण करती है तथा भोजन ग्रहण करती हैं.
अहोई अष्टमी व्रत कथा -
प्राचीनअहोई अष्टमी व्रत की कथा के अनुसार प्राचीन काल की बात है. एक साहूकार था, जिसके सात बेटे, बहुएं थी और एक बेटी भी थी. साहूकार की बेटी दीपावली के समय पर अपने ससुराल से मायके आई हुए थी. दीपावली के समय था, तो घर की साफ़ सफाई में सब बहुएं व्यस्त थी, घर लीपने के लिए मिट्टी की जरुरत पड़ी तो अपनी भाभियो के साथ साहूकार की बेटी भी जंगल चली गई.
साहूकार की बेटी जहाँ मिट्टी काट रही थी, वही एक स्याहु की माँद थी. लड़की ने जैसे ही कुदाल को जमीन में मारा कुदाल स्याहु के बचे को लग गई, जिससे उस बच्चे की मृत्यु हो गई. अपने बच्चे की मृत्यु से स्याहु विलाप करने लगी तथा लड़की से बोली तूने मेरी कोख सुनी की है, तो अब मैं तेरी कोख बांधूगी.
यह सुनकर लड़की क्षमा याचना करने लगी, तो स्याहु बोली कि कोख तो में बांधूगी जरूर या तो तू बंधवा या तेरी कोई भाभी बँधवाएगी, तब लड़की ने एक एक करके अपनी सभी भाभियो से पूछा, तो छः भाभियो ने ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने से मना कर दिया, पर सातवीं भाभी जो सबसे छोटी थी उसने सोचा अगर मैने भी कोख नहीं बंधवाई तो सासु माँ नाराज होगी, जिसके डर से सबसे छोटी भाभी ने ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली.
इसके बाद छोटी बहू को जो भी बच्चा होता, वह सात दिन के अंदर मर जाता था, इसी तरह जब उसके सात पुत्रों की मृत्यु हो गई, तो उसने एक ज्ञानी पंडित से इसका कारण पूछा. पंडित जी ने उसे बताया कि तुम्हारी कोख बंधी हुई है, इसलिए तुम्हारी संतान सात दिन के अंदर मर जाती है.
साहूकार की बहू ने पंडित से अपनी भाभी की कोख खुलवाने का उपाए पूछा तो पंडित जी ने बताया कि तुम सुराही गाय की सेवा करो तथा उन्हें प्रसन्न करो सुराही गाय स्याहु माता की सहेली है, वही तुम्हारी कोख छुड़वा सकती है.
इसके बाद साहूकार की बहू ने सुराही गाय की सेवा शुरू कर दी तथा वह रोज सुबह चुपचाप सुराही गाय के नीचे साफ़ सफाई कर आती, सुराही गाय ने सोचा ये कौन है, जो आजकल मेरी इतनी सेवा कर रहा है देखू तो जरा इसलिए वह गाय अगले दिन जल्दी उठी तथा देखा साहूकार की बहू चुपचाप उसके नीचे साफ़ सफाई कर रही है. सुराही गाय साहूकार के बेटे की बहू से बोली, मै तेरी सेवा से खुश हूँ, बता तुझे मुझसे क्या चाहिए मेरे हाथ में जो होगा मै तुझे दूँगी.
तब साहूकार के बेटे की बहू बोली मेरी कोख तुम्हारी सहेली स्याहु माता के पास बंधी पड़ी है. अगर आप मेरी कोख खुलवा दो, तो मुझे सेवा का फल मिल जायेगा. तब गौमाता बोली ठीक है, तथा साहूकार के बेटे की बहू को लेकर सात समुद्र पार अपनी सहेली के पास चल पड़ी. रास्ते में बहुत तेज धूप थी, तो दोनों आराम करने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गई.
उसी पेड़ पर गरुड़ पंखनी के बच्चे थे, जिन्हे एक साँप मारने की कोशिश कऱ रहा था, तब साहूकार के बेटे की बहु ने साप को मारकर नीचे दबा दिया तथा गरुड़ पंखनी के बच्चो रक्षा की. थोड़ी देर बाद जब गरुड़ पंखनी वहा आई और उसने खून पड़ा देखा तो वह साहूकार की बहू को चोंच मारने लगी, तब साहूकार के बेटे की बहू बोली मैने तेरे बच्चो को नहीं मारा बल्कि एक साँप से उनकी रक्षा की है.
जब गरुड़ पंखनी ने देखा कि उसके बच्चे सही सलामत है, तो वह साहूकार के बेटे की बहू से प्रसन्न होकर बोली कि माँग क्या मांगती है. तब साहूकार की बहू बोली सात समुद्र पार स्याऊ माता रहती है. आप मुझे उसके पास पंहुचा दो, तब गरुड़ पंखनी ने गौमाता तथा साहूकार के बेटे की बहू को अपनी पीठ पर बैठाकर स्याऊ माता के पास पंहुचा दिया.
स्याऊ माता अपनी सहेली गौमाता को देखकर बोली आ बहन बड़े दिनों बाद आई है. स्याऊ माता के सर में जूं पड़ गई थी, जिससे वह बहुत परेशान थी. तभी गौ माता ने साहूकार के बेटे की बहू को स्याऊ माता की जूं निकालने को बोला. साहूकार के बेटे की बहू ने सिलाई से स्याऊ माता की सारी जुएं निकाल दी, जिससे स्याऊ माता को बड़ा आराम मिला और वह साहूकार के बेटे की बहू पर बहुत प्रसन्न हुई. क्योकि स्याऊ माता संतान देने वाली माता है तो उन्होंने साहूकार की बहु से बोला कि तेरे सात बेटे तथा सात बहुएं हमेशा सलामत रहेंगे.
ऐसा सुनकर साहूकार की बहू बोली पर मुझे तो एक बेटा भी नहीं है, सात कहा से होंगे तब स्याऊ माता बोली कि वचन दिया, वचन से फिरू तो धोबी के कुंड की कंकरी होऊंगी. तब साहूकार की बहू बोली माता मेरी कोख तो तुम्हारे पास बंधी पड़ी है तथा स्याऊ माता को पूरी कहानी बताई, तब माता बोली साहूकार की बहू तूने तो मुझे ठग लिया, पर अगर वचन दिया है तो पूरा तो जरूर करुँगी, जा तुझे तेरे घर में सात बेटे तथा बहुऐं मिलेगी.
सात अहोई बनाकर सात कड़ाई करना तथा उजमन करना साहूकार के बेटे की बहू घर लौट आई और आकर देखा घर में सात बेटे तथा सात बहुएं बैठी है. यह देखकर वह बहुत खुश हुई उसने सात कढाई की, सात अहोई बनाई तथा सात उजमन किये इसके बाद जब दीपावली आई तो उसकी जेठानी आपस में बोलने लगी जल्दी से पूजा कर लो कही छोटी अपने बच्चो को याद करके रोने न लग जाये.
काफी देर तक जब रोने की आवाज नहीं आई तो एक जेठानी ने अपने बच्चे को पता करने भेजा कि देवरानी के घर में क्या हो रहा है. तब बच्चे ने आकर बताया कि चाची तो बहुत खुश है, खूब उजमन हो रहा है. यह सुनते ही जेठानियाँ दौड़ी दौड़ी उसके घर आई और पूछने लगी तेरी तो कोख बंधी हुए थी, फिर तेरी कोख कैसे खुली तब छोटी बहू बोली तुमने तो कोख बँधवाई नहीं मैने बँधवाई थी, लेकिन स्याऊ माता की कृपा से अब मेरी कोख खुल गई है तथा मेरा परिवार बेटे बहुओ से भर गया है.
हे स्याऊ माता जैसे आपने उस साहूकार के बेटे की बहू पर कृपा की तथा उसकी कोख खोली उसी प्रकार सबकी खोलना और इस कहानी को कहने, सुनने वाले सबकी कोख खोलना.
जय स्याऊ माता…
अहोई अष्टमी व्रत की दूसरी कथा
एक गाँव में एक साहूकार रहता था. उसके सात लड़के के थे. एक बार साहूकार की पत्नी दिवाली पर घर लीपने लिए अष्टमी तिथि को जंगल से मिट्टी लेने गई. जैसे ही उसने कुदाल चलाई, वह कुदाल साही के मांद पर लगी. जिसकी चोट से साही का बच्चा मर गया, इससे साहूकार की पत्नी को बड़ा दुःख हुआ, और वह बिना मिटटी लिए घर वापिस आ गई.
इसके बाद एक-एक करके साहूकार के सातों लड़के मर गए. जिसके कारण साहूकार और उसकी पत्नी शोक में रहने लगी. एक दिन साहूकार की पत्नी अपनी पड़ोसन से अपनी व्यथा बताई. तब पड़ोसन ने कहा कि तुम अहोई अष्टमी का व्रत रखो और और उस दिन साही और उसके बच्चों का चित्र बनाकर माँ भगवती की पूजा करो. क्षमा याचना करो, इससे तुम्हारे सारे पाप और कष्ट मिट जायेंगे.
ऐसा सुनकर साहूकार की पत्नी हर साल कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को माँ अहोई की पूजा और व्रत करने लगी. माता रानी की कृपा से साहूकार की पत्नी फिर से गर्भवती हुई और उसको एक सुंदर बच्चा हुआ. इस प्रकार उसके कई साल बाद एक एक करके फिर से सात बेटे हुए तभी से अहोई अष्टमी व्रत की परम्परा चली आ रही है.