यहां इस फ़िल्म में तो धर्म परिवर्तन, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, जाल साज़ी और लड़की के वीडियो वॉयरल जैसे क्रिमनल घटनाक्रम घटित हुए और पुलिस वाले को उल्टा पीड़िता के परिजनों से सुबूत मांगते हुए दिखाया गया है? हद है, किन्तु पुलिस अधिकांशतः ऐसे ही ढिलाई करती है।
फ़िल्म द केरला स्टोरी में अभिनेत्री अदा शर्मा की मां और सहेलियो की भूमिका निभाने वाली कलाकारों देखकर लगता है कि क्राइम पेट्रोल के किसी एपिसोड में हम इनको देख चुके है, इसका कारण यह है कि क्राइम पेट्रोल और इस फ़िल्म द केरला स्टोरी के प्रोड्यूसर विपुल शाह ही हैं। विपुल शाह के द्वारा ऑप्टिमिस्टिक नाम का प्रोडक्शन हॉउस चलाया जा रहा है, जिसने क्राइम पेट्रोल सीरीज के वर्ष 2011 से 2018 के एपिसोड्स का निर्माण किया है।
द केरला स्टोरी फ़िल्म को सनशाइन फिल्म्स नाम के बैनर तले बनाया गया है और एक लो बजट फ़िल्म है। फ़िल्म द केरला स्टोरी स्क्रीन से ज्यादा, मीडिया के खबरिया चैनलों और अखबारों में अधिक चर्चित रही और एक बड़ी बहस और चर्चा विषय बनी।
फ़िल्म देखने के बाद आप जान जायेंगे कि यह फ़िल्म बेहद बेहद डिस्टरबिंग है और द कश्मीर फाइल्स से भी अधिक सेंसेटिव मुद्दे को टच करती है। फिल्म के दृश्यों में चाहे लड़की का अपने मरणासन्न पिता के सिर पर थूक कर उसे मलना हो, या हीरोइन के गृह प्रवेश (अब अफगानी कल्चर में इस रिवाज़ के लिए क्या शब्द प्रयोग होता है नहीं पता) के समय चौखट पर मेढ़े का सिर काटना हो, या लिप्स्टिक लगाने पर महिला को सज़ा देने का सीन हो आपको झकझोर के रख देंगे।
फ़िल्म में अदा शर्मा के अलावा अन्य कोई बड़ा नामी कलाकार नहीं है, फ़िल्म द केरला स्टोरी का प्रोडक्शन सब्जेक्ट के हिसाब से जिस ग्रैंड स्केल पर होना चाहिए था वैसा नहीं हो पाया है, इस मामले में द कश्मीर फाइल्स काफी बेहतर है।
तालिबानी और आईएस आतंकवादीयो को टाटा और महिंद्रा के पिकअप ट्रक चलाते हुए दिखाया गया हैं, जिसमें दोनों ओर आईएस के काले झंडे लगे रहते हैं।
विलन्स को फिल्म में टिपिकल पाकिस्तानी आतंकवादियों की सी वेश भूषा और हाव भाव में दिखाया गया जो किसी भी एंगल से कन्विनसिंग नहीं लगता। इस पर थोड़ी गहराई से रिसर्च की जानी जरूरी थी तब वह पर्दे पर दिखाई जाती तो बेहतर रहता।
हालांकि प्रोड्यूसरों की भी अपनी विवशताऐं होती है और यह फिल्म एक प्रादेशिक फ़िल्म सी दिखाई देती है। अगर इस विषय पर एक वेब्सिरिज बनायीं गयी होती तो शायद अधिक सफल होती।
फ़िल्म द केरला स्टोरी का सेकंड हाफ काफी कुछ एस्केप फ्रॉम तालिबान से मेल खाता है तो वहीं फ़िल्म का फर्स्ट हाफ स्वीडिश वेबसीरीज कालीफेट से प्रभावित है। हालांकि द केरला स्टोरी भारत की सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्म है। मगर इन घटनाओं को डायरेक्टर ने अपने हिसाब से फ़िल्मी तड़का लगा कर एक झूठी थाली में परोसा है। झूठी थाली इसलिए क्योंकि ऐसी फिल्मों का ट्रेंड द कश्मीर फाइल्स और द ताशकंद फाइल्स जैसी फिल्मों से सेट हुआ है।
द कश्मीर फाइल्स, फिल्म द केरला स्टोरी की तुलना में एक वेल मेड फ़िल्म थी जिसमें एक प्रोफेशनलिज्म दिखता है। हालांकि लड़कियों के साथ हुई घटना पर फ़िल्में बन भी जाती है मगर लड़कों पर ऐसी फ़िल्म नहीं बन पाती हैं जबकि उनको भी हनी ट्रैप में फंसा कर खूब उल्टे सीधे काम करवाए जाते हैं।
इशरत जहां के केस में उसका पति केरल का ही एक कन्वर्टेड बंदा था, यह भी दिखाया जा सकता था। इस कांसेप्ट की बात करें तो फ़िल्म केवल महिलाओं के उत्पीड़न पर ही केंद्रित करने के बजाय उन लडकों के सच्चे प्रसंग भी दिखाये जा सकते है जिनको ब्रेनवॉश कर के सीरिया भेजा गया और बाद में आतंकियों ने उनसे पाखाने साफ कराए, ऐसा किया जाता तो फ़िल्म में और अधिक नाटकीयता आ सकती थी।
यह फ़िल्म देखनी तो बनती है और विशेष रूप से अपनी पत्नी, बेटी और बहनों को यह फ़िल्म अवश्य दिखाएं। उनका यह फ़िल्म देखना अधिक आवश्यक है, हालांकि वयस्क कॉन्टेन्ट है किंतु एक हार्ड रियलिटी पर बेस्ड है। सर्व धर्म समभाव और थू-ब्रल की बोगस बातें करने वाले आधुनिक समाज को यह फ़िल्म पूरी तरह से झकझोर रख देगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी इस फ़िल्म का जिक्र अपने भाषण में कर दिया है तो कुछ लोगों को इससे काफी असहजता जो गयी होगी। फ़िल्म प्रतिबंधित होने की प्रबल सम्भावना है इसलिए जितना जल्दी हो सके अवश्य देख लीजिए। किसी झूमते पठान या किसी की जान किसी का भाईजान से लाख गुना बेहतर कॉन्टेन्ट है द केरला स्टोरी।